सिलोगीः जितना शानदार अतीत, उतनी ही ज्यादा संभावनाएं

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अब बात करते हैं सिलोगी के उस ऐतिहासिक विद्यालय की, जो 1926 में स्थापित हुआ था। हम बात करेंगे सिलोगी के विद्यालय से 1957 में मैट्रिक जगदीश प्रसाद सिल्सवाल जी से। मानव भारती प्रस्तुति तक धिनाधिन की टीम ने यह जानने की कोशिश की कि उस समय क्या कुछ ऐसा था, जिसकी कमी वर्तमान में महसूस की जा रही है। आबोहवा के मामले में कमाल का है सिलोगी, क्या हम उससे स्वरोजगार औऱ तरक्की की राह बना पा रहे हैं।

हमने सिलोगी के उन पुराने छात्रों से बात की, जो केंद्र और राज्य सरकारों में अहम पदों पर सेवाएं देकर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनसे सिलोगी में सुविधाओं और करिअर की संभावनाओं को समझने का प्रयास किया। पार्लियामेंट में डेप्युटेशन पर तैनात रहे बीएसएफ इंस्पेक्टर (सेवानिवृत्त) रामानंद सिल्सवाल जी हमें राजकीय इंटर कालेज परिसर में ले गए। कॉलेज भवन के पिछले हिस्से में बड़ा मैदान है और पास ही लगभग खंडहर की हालत में एक भवन, के बारे में पूछा तो रामानंद जी ने बताया कि यह वर्षों पहले स्कूल का हॉस्टल था, वो भी 40 कक्षों वाला। मैदान से नीचे ढाल के बाद समतल भूमि पर किसी भवन के अवशेष बता रहे हैं कि कभी यहां भी चहल पहल होती थी।

पता चला कि यह मैस थी, जिसमें हॉस्टल के छात्रों के लिए भोजन बनता था। जहां तक उन अवशेषों को देखकर मैंने जो अनुमान लगाया, उस समय कितनी मेहनत से इन भवनों को बनाया गया होगा। कितने शानदार और आकर्षक रहे होंगे ये भवन। ग्रेफ से सेवानिवृत्त 80 वर्षीय जगदीश प्रसाद सिलस्वाल जी नजदीक ही कड़थी गांव के निवासी हैं। बताते हैं कि हॉस्टल में दूर के गांवों के छात्र रहते थे। छात्रों के घरों से रविवार की छुट्टी में सप्ताहभर का राशन आता था। छात्र संख्या के हिसाब से प्रतिदिन तोल कर राशन लिया जाता था। खाना बनाने के लिए स्टाफ था। छात्र अपने शिक्षकों की देखरेख में हॉस्टल में रहते थे। पानी लाने के लिए वहीं स्रोत पर जाना पड़ता था, जहां आज जा रहे हैं।

सेवानिवृत्त शिक्षक श्रीनंद सिलस्वाल जी ने 1962 में सिलोगी के विद्यालय से हाईस्कूल किया था। बताते हैं कि उस समय पूरे उत्तर प्रदेश में सिलोगी हाईस्कूल का रिजल्ट टॉप पर था। 96 परसेंट था रिजल्ट। हमारे प्रधानाचार्य जानकी प्रसाद कुकरेती जी, जाड़े की छुट्टियों में रोजाना तीन घंटे इंगलिश की क्लास लेते थे। उन्होंने सभी शिक्षकों को अवकाश के दिनों में प्रतिदिन एक-एक घंटे पढ़ाने के निर्देश दिए थे। 110 नाली भूमि वाले इस स्कूल में 40 ग्राम सभाओं से बच्चे आते थे।

नेहरू तारामंडल, दिल्ली से सेवानिवृत्त एलआर सिलस्वाल जी बताते हैं कि 60 के दशक में विद्यालय परिसर में सेब का बागीचा था। उस समय 10 हजार रुपये में सेब का ठेका छूटा था। अनुमान लगा सकते हैं कि कितना सेब उत्पादन होता था यहां। अब तो सेब के गिनती के ही पेड़ मिलेंगे यहां। सेब की पेटियों को खच्चरों पर लादकर दुगड्डा भेजा जाता था। वर्तमान में भी यहां बागवानी हो सकती है, जो स्वरोजगार का माध्यम बन सकती है। गुलाब की तमाम किस्में यहां की खूबसूरती को बढ़ा रही थीं।

रामाकांत जी ने बताया कि हम कड़थी गांव से आते थे। स्कूल की पहली घंटी बजने के समय हम रास्ते में होते थे, यही कोई डेढ़ किमी. दूर। घंटी सुनते ही हम दौड़ लगाते थे। उस समय दस से 15 मिनट में स्कूल पहुंच जाते थे। बहुत सारे बच्चे तो 20 से 25 किमी. दूर से पैदल आते थे। परिवहन के साधन कहां थे। शाम को छुट्टी हुई और घर पहुंचते पहुंचते रात हो गई। खाना खाया और थोड़ी देर सोने के बाद फिर स्कूल की तैयारी। पहाड़ में उस समय कुछ ऐसी थी छात्रों की लाइफ। हालांकि दूर के गांवों के अधिकतर छात्र हॉस्टल मे रहते थे।

पुराने छात्रों के अनुसार 1926 में स्कूल की स्थापना की कहानी कुछ यह है। चैलूसैंण में एक स्कूल था, जहां की व्यवस्थाओं से नाराज होकर शिक्षक और कुछ छात्र सिलोगी पहुंच गए। ग्रामीणों ने फैसला लिया कि सिलोगी में ही स्कूल शुरू किया जाए। छप्पर लगाकर स्कूल खोल दिया गया। लोगों ने अपनी जमीनों को शिक्षा के लिए दान किया। धीरे-धीरे विद्यालय का भवन बनाया गया। हॉस्टल और मैस बनाए गए। विद्यालय का 60 के दशक वाला भवन सिलोगी की शान है। टीन की चादरों वाली छत पर रैन वाटर हार्वेस्टिंग के इंतजाम भी दिखते हैं। कमाल की सोच थी इस शानदार इमारत को बनाने वालों की।

रामाकांत जी कहते हैं कि यह पूरी फ्रूट बेल्ट है, जिसमें स्वरोजगार की भरपूर संभावनाएं हैं। बताते हैं कि 60 के दशक में विद्यालय में कृषि और बागवानी पर बहुत काम होता था। विद्यालय के पास बैलों की जोड़ी थी। कृषि के सारे संसाधन उपलब्ध थे। मैदान दिखाते हुए बताते हैं कि इसको स्पोट् र्स मैदान के रूप में तब्दील किया जा सकता है। यहां स्पोट् र्स हॉस्टल बनाया जा सकता है। कोई ऐसी एजेंसी हो, जहां यहां एग्रीकलचर को डेवलप करे। चारों तरफ फलदार वृक्ष लगाए जाएं, जिनसे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा। जब उस समय सेब की बागबानी की जा सकती थी,तो वर्तमान में क्यों नहीं। उनका सुझाव है कि ह्यूंल नदी पर जगह-जगह बांध बनाकर सिंचाई और मत्स्य पालन किया जा सकता है। खेतों में फल बागवानी की जाए।

पलायन पर चर्चा करते हुए बताते हैं कि रोड कनेक्टिविटी नहीं होने की वजह से सुविधाएं नहीं बढ़ीं। इस गांव के आसपास के क्षेत्रों की लगभग 36 फैमिली हर साल यहां से बाहर जा रही हैं। वर्ष 92 तक हमारे गांव में 300 परिवार थे, आज यहां 50 लोग भी नहीं रह गए, कारण वही संसाधनों की कमी। मुख्य समस्या पानी की है। कनेक्टिविटी नहीं है।

कुल मिलाकर सिलोगी में घर-घर पानी पहुंचाने के साथ जरूरत है प्रकृति के संसाधनों का पर्यावरण सम्मत इस्तेमाल करके स्वरोजगार के साधन विकसित करने की। तक धिनाधिन की टीम को सिलोगी के बच्चों और बुजुर्गों को सुनने और कुछ अपनी सुनाने का मौका मिला। इसके लिए छात्र जीवन में ग्राम बागों के निवासी रहे गुरुकुल प्ले स्कूल डोईवाला के संस्थापक हेमचंद्र रियाल जी का बहुत बहुत शुक्रिया। सिलोगी के सभी फोटोग्राफ सार्थक पांडेय क्लास 9 ने क्लिक किए। फिर मिलते हैं किसी और पड़ाव पर, तब तक के लिए आपको बहुत सारी खुशियों और शुभकामनाओं का तक धिनाधिन।

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