Analysis

पांच साल में हर परिवार पर होगी अपनी कार

यही स्पीड रही तो उत्तराखंड में रोजाना बिकेंगी डेढ़ सौ से ज्यादा कार

अगर यही स्पीड रही तो उत्तराखंड में कारों और बाइकों के रजिस्ट्रेशन का आंकड़ा रोजाना 155 कार और 756 बाइक तक पहुंच सकता है। यह आंकड़ा कारों के नौ और बाइकों की संख्या में 13 फीसदी वृद्धि दर के अनुमान से है। यह डाटा केवल निजी इस्तेमाल के लिए खरीदी जाने वाली कारों, जीपों और बाइक का है। हालांकि इससे पहले 2013-14 में कारों की खरीदारी पिछले साल से कम हुई थी। वहीं पब्लिक का ट्रांसपोर्ट टैक्सी मैक्सी के आंकड़े में लगातार गिरावट दर्ज होते हुए राज्यभर में रोजाना का रजिस्ट्रेशन में पांच तक पहुंच सकता है।

पांच साल बाद का अनुमानित हाल

  • 2019-2020  में 13 फीसदी रजिस्ट्रेशन दर के हिसाब से राज्य में 276244 बाइक हो सकती हैं रजिस्टर्ड। इस हिसाब से रोजाना बिक्री का आंकड़ा 756 तक पहुंच जाएगा।
  •  2019-2020  में 09 फीसदी रजिस्ट्रेशन दर के हिसाब से राज्य में   56767   कार जीप हो सकती हैं रजिस्टर्ड। इस हिसाब से रोजाना बिक्री का आंकड़ा 155 तक पहुंच जाएगा।
  • 2019-2020  में 07 फीसदी रजिस्ट्रेशन दर के हिसाब से राज्य में   2127  टैक्सी मैक्सी हो सकती हैं रजिस्टर्ड। इस हिसाब से रोजाना बिक्री का आंकड़ा मात्र पांच तक पहुंच जाएगा।

    रजिस्ट्रेशन और राजस्व

  • 13 फीसदी बढ़ी बाइकों का रजिस्ट्रेशन 2014 से 2015 के बीच
  • 09 फीसदी वृद्धि हुई प्राइवेट कारों और जीपों के रजिस्ट्रेशन में 2014 से 2015 के बीच
  • 07 फीसदी घटी सार्वजनिक परिवहन के लिए गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन (आटो टैंपों की संख्या डबल हो गई)

घर में गाड़ियों का गणित

  • 06 घरों पर एक कार उत्तराखंड में
  • 01 से ज्यादा बाइक है एक घर में(अनुमानित आंकड़े 2011 की जनगणना और परिवहन विभाग के डाटा के आधार पर)
  • न्यूज लाइव रिपोर्ट

‘दुनिया सरनौल तक है उसके बाद बड़ियाड़ है’

‘पलायन एक चिंतन’ अभियान के तहत रवांई के ‘बड़ियाड़’ क्षेत्र की यात्रा (13-16 जुलाई 2016) से लौटकर डॉ. अरुण कुकसाल की रिपोर्ट-

Arun Kuksaal
डॉ. अरुण कुकसाल

रवांई-उत्तरकाशी जनपद की पश्चिमोेत्तर दिशा में स्थित संपूर्ण यमुना घाटी की ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक पहचान रवांई नाम से विख्यात है। दूसरे शब्दों में नौगांव, पुरोला एवं मोरी विकासखंडों के संयुक्त भू-भाग को रवांई कहा जाता है। गढ़वाल के इतिहास में ‘रवांई’ को ‘रांई गढ़’ कहने का भी उल्लेख है। कहा ये भी जाता है कि ऊनी वस्त्रों को बनाने और उनको रंगने में रवांईजन सिद्धहस्त रहे हैं। रंगवाई से रवांई हुआ होगा। रवांई रणबाकुरों का मुल्क है। रणवाले से रवांई होने की भी संभावना है। इस तथ्य में दम है, क्योंकि रवांई के लोगों का आदि काल से ही राजसत्ता के प्रति हमेशा पंगा रहा है। ‘रयि’ शब्द प्राकृतिक एवं धन्य-धान्य से धनी क्षेत्र के अर्थ में भी है। इसलिए ‘रयि’ से रवांई होने की भी गुंजाइश है।
ऐतिहासिक तथ्य हैं कि महाभारत काल में रवांई क्षेत्र में कुलिन्द शासक सुबाहु का राज था जिसने पाडंवो को अनेक प्रकार से सहायता प्रदान की थी। पांडवों और कौरवो के इस क्षेत्र में लम्बे प्रवास के कारण रवांई के रीति-रिवाजों में महाभारत कालीन प्रभाव आज भी दिखाई देते हं। खूबसूरत घरों और मंदिरों से सजे-धजे रवांई क्षेत्र में प्रवाहित टौंस (सहायक नदी रुपिन-सुपिन) और यमुना नदी ने यहां के जन-जीवन को आर्थिक मजबूती के साथ सांस्कृतिक संपन्नता भी प्रदान की है। इतिहास गवाह है कि एक तरफ राजसत्ता यहां की आर्थिक और सांस्कृतिक धरोहर को हड़पने की कोशिशे करता रहा तो दूसरी ओर राजतंत्र की संप्रभुता को यहां के लोग लगातार चुनौती देते रहे। गढ़वाल में ‘ढंडक’ (जनता द्वारा राजसत्ता की निरंकुश नीतियों का सामूहिक विरोध करना) शब्द की उत्पत्ति इसी क्षेत्र से हुई। सुन्दरता और सम्पन्नता जोखिम की जन्मदायी हैं, यह रवांई में आकर बखूबी समझा जा सकता है। मानवीय सुन्दरता और प्रकृति-प्रदत सम्पन्नता को कुटिल एवं आतातायी समुदायों एवं शासकों से बचाये रखने के लिए स्थानीय लोगों के संघर्ष के कई निशान दर निशान रवांई में व्याप्त हैं। इसी तारतम्य में रवांई के लोगों का राडी (20 मई 1930) एवं तिलाड़ी (30 मई 1930) स्थल में जन-विद्रोह उनकी चरम अभिव्यक्ति थी, जिसमें 100 से ज्यादा लोगों ने राजशाही अन्याय का प्रतिरोध करते हुए जान गंवा दी थी।

Slide2रवांई की एक पट्टी का नाम है ‘बड़ियाड़’। पुरोला विकासखंड में शामिल ‘बड़ियाड’ पट्टी 8 गांवों यथा- सर, ल्यौटाड़ी, डिंगाड़ी, किमडार, कसलो, पौंटी, छानिका और गोल से मिलकर बनी है। ग्राम पंचायत के हिसाब से ‘बड़ियाड़’ पट्टी में 3 ग्राम पंचायतें यथा- सर (सर, ल्यौटाडी एवं डिंगाडी), किमडार (किमडार एवं कसलो) और पौंटी ( पौंटी, छानिका एवं गोल) शामिल हैं। जनगणना 2011 के अनुसार बड़ियाड़ पट्टी की कुल आबादी 1363 है, जिसमें 253 (18.56 प्रतिशत) अनुसूचित जाति के व्यक्ति हैं। बड़ियाड़ पट्टी का कोई भी गांव सड़क से आज भी नहीं जुड़ पाया है। जी हां, बड़ियाड़ के प्रत्येक ग्रामीण को विकासखंड पुरोला आने के लिए 35 किमी़. की दुर्गम पैदल दूरी तय करनी होती है। बरसात एवं बर्फबारी के महीनों में आवश्यक अनाज एवं सामान की व्यवस्था कर वे अपने ही घर-गांवों में दुबके रहकर शेष दुनिया से अंतर्ध्यान रहते हैं। ऐसे उदाहरण आम है कि जब ग्रामीण अपने बीमार परिवारजन को डंडी-कंडी से पैदल मार्गों के टूट जाने के कारण 35 किमी.दूर पुरोला के अस्पताल नहीं पहुंचा पाए।बड़ियाड़ को सड़क मार्ग से जोड़ने के प्रथम प्रयास वर्ष 2008 में हुए थे। पर आज यह हाल है कि गंगताड़ी से सर गांव को जोड़ने वाली 12 किमी. की ये निर्माणाधीन सड़क सन् 2008 से मात्र 2 किमी. बनकर शासकीय लापरवाही के कारण दम तोड़ चुकी है।

 देश-प्रदेश में शिक्षा के रखवालों ने बड़ियाड़ क्षेत्र में आठवीं तक की प्रारंभिक व्यवस्था करके अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली है। वर्तमान में इस संपूर्ण पट्टी में 8 प्राइमरी स्कूल एवं 4 जूनियर हाईस्कूल यथा- डिंगाडी, सर, पौंटी और किमडार गांव में हैं। बिडम्बना यह है कि कुल जमा 4 जूनियर हाईस्कूलों में 6 से 8 तक की कक्षाओं में मात्र 32 बच्चे अध्ययनरत हैं। पौंटी में 2 और किमडार में शून्य छात्र संख्या होने के कारण स्कूल बंदी के कगार पर हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर पूरी पट्टी के लिए एक आर्युवेदिक केन्द्र सर गांव में है, जिसमें फार्मासिस्ट की नियुक्तिभर है। आंगनबाडी, महिला मंगल दलों से अधिकतर ग्रामीण परिचित भी नहीं है। पटवारी चौकी का भवन डिंगाडी गांव में बनने के बाद पटवारी अपने निवास कम कार्यालय में प्रवेश के लिए भी कभी नहीं पहुंचे। नतीजन, इस पटवारी भवन की नियति उजड़ने के लिए ही है। एक अदद डाकघर खोलने की मांग बड़ियाड़ पट्टी के लोग वर्षों से करते आ रहे हैं। उनकी पट्टी में भी पोस्ट आफिस होगा यह अभी उनका सपना ही है। देश की स्वतंत्रता के बाद से बडि़याड़ पट्टी आने वाले उच्च अधिकारियों में पूर्व में तैनात राजेश कुमार, मुख्य विकास अधिकारी औऱ अमित घोष जिलाधिकारी, टिहरी के नाम दर्ज हैं। राजनेता वोट मांगने ही आ जांए वही गनीमत है। जीतने के बाद विधायक की शक्ल कैसी हो जाती है, यहां के लोग नहीं जानते।Slide3
देश-प्रदेश के स्वच्छता अभियान के प्रति जागरूकता की एक तस्वीर यह भी है कि बडियाड़ पट्टी के 8 गांवों में किसी भी घर में शौचालय नहीं है। शौच के लिए शौचालय होते हैं, यह जानकारी अधिकतर ग्रामीणों (विशेषकर महिलाओं) को नहीं है। स्वजल परियोजना को पट्टी के सभी 8 गावों में शौचालय बनाने का जिम्मा है पर उनके नुमायंदे वर्षों से कहां सोये हैं, किसी को पता नहीं। शिक्षक, फार्मासिस्ट और आंगनबाडी कार्यकर्ता गांवों में अपने-अपने कार्यदायित्वों के लिए आ जाए वो दिन विशेष होता है। वे अपनी संग्रांद बजाकर मनमर्जी से जब चाहे जहां चाहें चले जाएं कोई देखने और पूछने वाला नहीं है। बड़ियाड़ पट्टी में जीवन की दुश्वारियों का ये एक जिक्रभर है। उनके जीवन की जीवटता और जीवन्तता को आप भी महसूस करें, आइये, ‘पलायन एक चिंतन’ अभियान के माध्यम से आपको लिए चलता हूं सर बड़ियाड़ पट्टी की ओर…

उत्तराखंड में हर साल 24 अरब की नई बाइक-कारें

देहरादून, हल्द्वानी और हरिद्वार ही नहीं पूरे राज्य की सड़कों पर तरक्की फर्राटा भर रही है। उत्तराखंड में साल दर साल प्राइवेट गाड़ियों की बढ़ती संख्या बेहतर जीवन स्तर की ओर भी इशारा करती है। हालांकि राज्य में बड़ी संख्या में लोग आज भी परिवहन के संसाधनों से दूर है। खैर परिवहन विभाग का डाटा तो राज्य में तरक्की का राग सुना रहा है।

उत्तराखंड में हर साल गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन के डाटा का विश्लेषण किया जाए तो कई जानकारियां सामने आती हैं,जो मजबूत होती आर्थिकी की ओर इशारा कर रही हैं। इसके साथ ही लगातार जनता के परिवहन में कमी की बात भी कहती है। परिवहन विभाग के अनुसार 2014-15 में 149936 बाइक और 36896 प्राइवेट कार और जीपों का रजिस्ट्रेशन हुआ है। वहीं कमर्शियल व्हीकल में टैक्सी, मैक्सी के रजिस्ट्रेशन की संख्या 3056 है।

इन आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि उत्तराखंड में रोजाना लगभग 100 कारों और जीपों तथा 418 बाइकों का रजिस्ट्रेशन हो रहा है। 2015-16 के आंकड़े इनसे ज्यादा हो सकते हैं। अगर 2013-14 के डाटा से तुलना की जाए तो बाइकों के मामले में रजिस्ट्रेशन की संख्या 13 फीसदी और कारों की नौ फीसदी की दर से बढ़ी है। अगर राज्य में बाहर की गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन की संख्या 10 फीसदी भी मान ली जाए, तो भी राज्य में कारों और जीपों की सालाना खरीदारी की लागत लगभग 16 अरब 42 करोड़ बैठती है। जबकि इसमें टैक्सी मैक्सी की खरीदारी का डाटा शामिल नहीं है।

[huge_it_slider id=”3″]

गाड़ियों का काराेबार

  • 418 बाइक रोजाना बिकती हैं, जिनका मूल्य लगभग 2.90 करोड़।
  • 07 अरब  49 करोड़ का है बाइकों का सालभर का काराेबार ( प्रति बाइक 50,000 रुपये के अनुसार)
  • 100 कारें लगभग रोजाना बिकती हैं जिनका मूल्य लगभग 5 करोड़।  इनमें प्राइवेट इस्तेमाल की ही कारें शामिल हैं।
  • 5 करोड़ लगभग का कारोबार है कारों का सालाना कारोबार ( औसतन प्रति कार 5 लाख रुपये के अनुसार)
  • उत्तराखंड में बाहर के प्रदेशों से खरीदी कारें भी रजिस्टर्ड होती हैं। अगर इनकी संख्या 10 फीसदी भी मानें तो भी यहां कारों की खरीदारी का आंकड़ा सालाना 16अरब 42 करोड़  बैठता है।
  • 23 अरब 91 करोड़ लगभग का है उत्तराखंड में कारों और बाइक का सालाना काराेबार ।

क्यों बढ़ रहे प्राइवेट वाहन

  • राज्यभर में कई स्थानों पर रात आठ बजे के बाद सार्वजनिक परिवहन सेवा में कमी के कारण बाइकों की खरीदारी बढ़ी।
  • समय बचाने और सुविधा को देखते हुए लोग अपनी गाड़ियों से सफर करना ज्यादा पसंद करते हैं।
  • परचेजिंग पावर बढ़ी है और ईएमआई की सुविधा ने गाड़ियों की खरीदारी को आसान किया है।
  • रोजाना एक से दूसरे शहर में सफर करने के लिए बाइक सबसे ज्यादा सुविधायुक्त औऱ सस्ता साधन।

न्यूज लाइव रिपोर्ट


उत्तराखंड में कम हो रहा सार्वजनिक परिवहन

 हर साल सात फीसदी की दर से कम हो रही सार्वजनिक परिवहन के लिए गाड़ियाें की खरीदारी

भले ही उत्तराखंड परिवहन विभाग की कमाई में साल दर साल बढोतरी हुई हो, लेकिन जनता के लिए परिवहन के साधनों में गिरावट का दौर जारी है। खुद विभाग के आंकड़े ही  खुलासा कर रहे हैं कि राज्य में  टैक्सी, मैक्सी के रजिस्ट्रेशन में हर साल लगभग सात फीसदी की कमी आई है। वहीं राज्य में बाइकों और प्राइवेट downloadकारों, जीपों की खरीदारी तेजी पर है,  जो रोजाना लगभग आठ करोड़ रुपये तक है। राज्य में पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों तक की परिवहन व्यवस्था निजी कंपनियों की बसों और टैक्सी, मैक्सी और रोडवेज के भरोसे है, लेकिन कई रूटों पर ये सेवाएं भी नहीं हैं। रात नौ बजे के बाद शहर और बाहर सार्वजनिक परिवहन सिस्टम गायब हो जाता है। हालांकि शहरों में अॉटो टैंपों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन रात को यात्रा महंगी हो जाती है, जिस पर कोई अंकुश नहीं है।

क्या है आंकड़ा

72 फीसदी बाइकें हैं राज्यभर की कुल गाड़ियों में
16 फीसदी प्राइवेट कार और जीप हैं कुल वाहनों में
3.34 फीसदी ही है सार्वजनिक वाहनों की संख्या ( बसें, टैक्सी, मैक्सी, आटो टैंपो शामिल)

राज्य में कितने लोगों पर गाड़ियां

32 व्यक्तियों पर एक प्राइवेट कार और जीप है उत्तराखंड में
160 लाेगों पर एक पब्लिक ट्रांसपोर्ट है राज्य में,जिनमें बस, टैक्सी, मैक्सी, आटो टैंपो शामिल हैं
166 लोगों पर शहरों में एक अॉटो टैंपों ( प्रदेश की शहरी आबादी के अनुसार)
10 साल में साढ़े चार गुना तक सालाना पहुंच गई टू व्हीलरों औऱ प्राइवेट कारों जीपों की खरीददारी

राजस्व का हाल

2003-04 की तुलना में 11 साल में ट्रांसपोर्ट से मिला राजस्व  4.6 गुना हो गया
2012-13 को छोड़ दिया जाए तो हर साल राजस्व में तेजी से बढोतरी हो रही है

क्यों कम हो रहा राज्य में सार्वजनिक परिवहन
हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और वेस्ट यूपी से मसूरी, नैनीताल, कार्बेट, चकराता, रानीखेत और अन्य टूरिस्ट स्पॉट पर आने वाले अधिकतर पर्यटक अपनी गाड़ियों से आ रहे हैं।
दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश की ट्रेवलिंग कंपनियों का दखल बढ़ा है। दिल्ली और अन्य राज्यों से ही बुकिंग पर गाड़ियां उपलब्ध होती हैं।होटलों के साथ गाड़ियों की अॉनलाइन बुकिंग भी बाहर की ट्रेवलिंग एंड टूरिज्म कंपनियां कर रही हैं।
उत्तराखंड के लिए लग्जरी बस औऱ रेल सेवाएं बढ़ी हैं।
राज्य में रजिस्टर्ड टैक्सी, मैक्सी और निजी बसों का अधिकतर काम लगभग छह माह यात्रा सीजन में ही चल पाता है। बाकी माह पहाड़ से स्थानीय सवारियों को सेवा देने में बीतता है।
स्थानीय अधिकतर लोग अपने ही वाहनों से यात्रा करते हैं।
चारधाम यात्रा के दौरान भी काफी संख्या में यात्री अपनी ही गाड़ियों से आ रहे हैं।

क्यों बढ़ रहे प्राइवेट वाहन
राज्यभर में कई स्थानों पर रात आठ बजे के बाद सार्वजनिक परिवहन सेवा में कमी के कारण बाइकों की खरीदारी बढ़ी।
समय बचाने और सुविधा को देखते हुए लोग अपनी गाड़ियों से सफर करना ज्यादा पसंद करते हैं।
परचेजिंग पावर बढ़ी है और ईएमआई की सुविधा ने गाड़ियों की खरीदारी को आसान किया है।
रोजाना एक से दूसरे शहर में सफर करने के लिए बाइक सबसे ज्यादा सुविधायुक्त औऱ सस्ता साधन।

शहरों में क्यों बढ़े अॉटो टैंपो

शहर में ही एक स्थान से दूसरी जगह जाने के लिए अॉटो टैंपों का ज्यादा इस्तेमाल।
पार्किंग की पर्याप्त सुविधा नहीं होना है। बार-बार जाम में फंसना।
शहरों में सड़कों की स्थिति सही नहीं होना।

क्या हैं दिक्कतें
राज्य के पर्वतीय जिलों के लिंक रोड पर परिवहन सेवा में कमी।
लंबी दूरी के लिए चलने वाली गाड़ियों में रास्ते के गांवों और कस्बों की सवारियां नहीं बैठ पाती।
गाड़ियां कम होने और सवारियों की संख्या ज्यादा होने पर ओवरलोडिंग की समस्या।
यात्रा सीजन में स्थानीय लोगों के लिए परिवहन सेवाओं में कमी।
मैदानी इलाकों में भी रात आठ बजे के बाद कम दूरी के लिए परिवहन सेवाएं मुश्किल से मिलती है।

  •  न्यूज लाइव रिपोर्ट 

श्री बद्रीनाथ धाम : तप्तकुंड में स्नान जरूरी, व्यवस्थाएं अधूरी

ANITA MAITHANI
अनीता मैठाणी

हिमालय पर्वत श्रृंख्लाओं पर समुद्र सतह से 3000 मीटर ऊंचाई पर श्री बद्रीनाथ प्रसिद्ध धाम में भगवान विष्णु श्री बद्रीनाथ के रूप में विराजमान हैं। भगवान बदरी विशाल का पावन मंदिर अलकनन्दा नदी के दायें तट पर है। हर साल भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के लिए देशभर से लाखों तीर्थयात्री पहुंचते हैं। देहरादून से लगभग 328 किमी दूरी पर श्री बद्रीनाथ धाम से करीब पांच किमी. आगे भारत का अंतिम गाँव माणा बसा हुआ है। यहीं से आगे सतोपंथ और स्वर्गारोहणी की ओर जाया जा सकता है। बद्रीनाथ मंदिर में जाने से पहले अलकनन्दा नदी को पार करते ही पुल के दाईं ओर प्राकृतिक गर्म पानी के स्रोत है, जिन्हें तप्तकुण्ड कहा जाता है। सल्फ़र के गर्म पानी युक्त स्रोत और कुण्डों में स्नान करने के बाद श्री बद्रीविशाल के चरणों में पूजा अर्चना की जाती है। हाल ही में जुलाई के प्रथम सप्ताह में मुझे श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला।

IMG_0764
बद्रीनाथ धाम पहुँचते ही तप्त कुण्ड में स्नान के लिए पहुँचे तो देखा पानी बहुत गर्म है। बद्रीनाथ जी के दर्शन से पहले तप्तकुण्ड में स्नान अनिवार्य बताया जाता है,लेकिन तप्तकुण्ड के आस-पास की व्यवस्थाएं देखकर मन में बड़ी ठेस पहुँची। बताया गया कि जैसे-जैसे ठण्ड बढ़ती है वैसे-वैसे पानी और अधिक गर्म होने लगता है। हालांकि यहाँ पर महिलाओं और पुरूषों के लिए टिन की छत से ढके अलग-अलग तप्तकुण्ड हैं, लेकिन महिला कुण्ड के चारों ओर किसी भी प्रकार का प्लेटफाॅर्म या पानी में उतरने के लिए पर्याप्त चौड़ाई वाली सीढ़ियां नहीं बनी हैं। यानि सीढ़ी की चौड़ाई जिस पर पांव रखकर कुण्ड में स्नान के लिए उतरना है, उसकी चौड़ाई बामुश्किल 6-7 इंच होगी। यही नहीं एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी के बीच डेढ़ फीट के लगभग दूरी है। जिससे मुझे तो तप्तकुण्ड में उतरने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा। साथ में बच्चों को स्नान के लिए सामान्य से गर्म पानी में गिरने का भय भी मन में बना रहा।
श्री बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति महिला तप्तकुण्ड के आस-पास सही ढंग से सीढियां और पहले तो तीन तरफ नहीं तो कम से कम दो तरफ ऊपर बैठकर स्नान करने के लिए पैड़ी / सीढी  बना सकती है। उन ऊँची-ऊँची सीढ़ी पर खड़े रहकर स्नान करना तो वाकई दिक्कत भरा है। क्योंकि उन सीढ़ियों से सीधे तप्तकुण्ड में डुबकी लगाना मुझे तो असंभव ही लगा। क्योंकि पानी का तापमान मेरे TAPT KUNDअनुमान के अनुसार 3 जुलाई को 60 डिग्री के आस-पास था। साथ ही यह भी सोच रही थी कि सभी महिलाएं इसी परिस्थिति में स्नान करती होंगी। क्या मुझे ही यह कमियां नजर आ रही हैं। मुझे लगा कि श्रद्धालुओं को ये अव्यवस्थाएं तीर्थयात्रा के महत्व के सामने महसूस नहीं होती। अगर महसूस भी हों तो इसके बारे में किससे कहें। तप्तकुण्ड में ठण्डे और गर्म पानी को मिक्स करने की कोई व्यवस्था जरूर होनी चाहिए।
पुरूषों के लिए तप्तकुण्ड के बाहर और अलकनन्दा नदी के ऊपर पानी को धाराओं में बांटा गया है। वहाँ ठण्डे पानी के लिए एकमात्र आधे इंच का स्टैंड पोस्ट लगा है। तप्तकुण्ड से बाहर आते गर्म पानी को ठण्डे पानी के साथ मिलाने की कोई व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि मान्यता है कि बिना तप्तकुण्ड में स्नान किए भगवान बद्रीविशाल के दर्शन करना उचित नहीं है।

IMG_0666यह तो अनूठा संयोग है कि जहाँ भी ऐसे धार्मिक स्थल हैं वे हिमालय में अत्यधिक हाड़ कंपाने वाली ठंडे स्थानों पर स्थित है और वहाँ सल्फर के गर्म पानी के स्रोत जैसे- यमुनोत्री, गंगोत्री घाटी में गंगनानी, चमोली में तपोवन और श्री बद्रीनाथ में तप्तकुण्ड हैं। ऐसा अन्य स्थानों पर भी है। श्रीबद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति धर्म और तीर्थाटन के साथ-साथ पर्यटन से अरबों रूपये की आमदनी करती है, इससे राज्य को राजस्व के साथ स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है।मेरा मानना है कि मंदिर समिति को यात्रियों के लिए बेहतर सुविधाएं जुटानी होंगी। महिला तप्तकुण्ड की अव्यवस्था को महिलाओं के दृष्टिकोण से भी देखा जाना आवश्यक है। तप्तकुण्ड की सीढियों के बीच का अंतर नीति निर्माता और इंजीनियर के पुरूषवादी दृष्टिकोण को उजागर करता है। इस पर ध्यान देते हुए मंदिर समिति को महिला तप्तकुण्ड में बेहतर सुविधाएं करनी चाहिए।

यहां भी ध्यान दीजिए

ब्रह्मकपाल से मंदिर तक तीर्थयात्रियों के लाइन में खड़े रहने के लिए जो लम्बे-लम्बे शेड बनाए गएं हैं, उनके छोर पर टाॅयलेट की समुचित व्यवस्था भी होनी आवश्यक है। हर टाॅयलेट का अपना सीवेज़ सिस्टम होना जरूरी है, क्योंकि ठीक नीचे अलकनन्दा नदी बहती है। पुरूष तप्तकुंड के सामने कपड़े टांगने और जूते आदि रखने के लिए समुचित रैक ओर स्टैंड होना चाहिए। यही व्यवस्था महिला तप्तकुण्ड के लिए भी की जानी चाहिए। श्री बद्रीनाथ मंदिर के मुख्यद्वार के विशाल घंटे को सिर्फ 6 फीट लंबा व्यक्ति ही उछलकर बजा सकता है। बारिश वाले दिनों में कम हाइट वाले यात्री घण्टा बजाने की चेष्टा में उछलने पर सीढियों पर फिसल जाते हैं।

यहां कुछ प्रशंसनीय हुआ

मुख्य गेट के भीतर मंदिर की परिक्रमा परिसर में सुंदर लकड़ी का फर्श बनाया गया है, पूर्व में यह पूरा फर्श पत्थर का था। जिसमें दर्शन के लिए घंटो खड़े यात्रियों के नंगे पांव ठंड से जम जाते थे। इस बात के लिए मंदिर समिति का यह प्रयास सराहनीय है।
साथ ही मंदिर समिति का यह प्रयास होना चाहिए कि वो तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं प्रदान करे। समिति का ध्यान सिर्फ दान-दक्षिणा और चढ़ावे पर ही ध्यान न रहे। इस बार कपाट बंद होने के समय गर्म पानी के स्रोत को डायवर्ट करके तप्तकुण्ड सुधार के कार्य किए जा सकते हैं। और यात्रा सीज़न आने पर पुनः पूर्व की भांति बेहतर सुविधाओं के साथ तप्तकुण्ड यात्रियों के लिए उपलब्ध हो। इससे देशभर में बेहतर संदेश जाएगा।IMG_0660
   भगवान श्री बद्रीविशाल के दर्शन के बाद मन में तप्तकुण्ड की अव्यवस्था का जो दुःख पसरा था वो दूर हो गया। लेकिन हर सीज़न यहाँ आने वालीं लाखों महिला तीर्थयात्रियों को भविष्य में मेरी तरह  बुरा अनुभव न झेलना पड़े। यात्रियों को बेहतर सुविधा ही मंदिर समिति का उद्देश्य हो। हमारे उत्तराखंड के प्रसिद्ध बद्रीनाथ धाम की महिमा सदैव अक्षुण्ण रहे, इन्हीं आशाओं के साथ!
  • अनीता मैठाणी, देहरादून


कीड़ाजड़ी का सामाजिक और आर्थिक सच                 

चिपको आन्दोलन की घाटी आज पेड़ बचाओ के संदेश से हटकर कीड़ाजड़ी संग्रहण के विवादों में चर्चित हो रही है। जनपद चमोली में नीति मलारी घाटी के क्षेत्र के उच्च हिमालयी बुग्यालों में पाए जाने वाली कीड़ाजड़ी अब आपसी संघर्ष का कारण बन गई है। सबसे दुखद पहलू तो यह है कि कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने के लिए लोग हिमालयी बुग्यालों में लड़ने लगे हैं।

1-JP pp
जेपी मैठाणी

बात कुछ समय पहले की है, जब कीड़ाजड़ी लेने बुग्याल गए रैणी व सुभांई गाँव के लोग जंगल में ही आपस में लड़ने लगे, जिसमें रैणी पल्ली गाँव की तीन महिलाओं को चोट तक लग गई। दूसरी ओर विवाद बढ़ने पर कई गाँवों के लोगों ने नन्दा देवी बायोस्फियर के जोशीमठ कार्यालय में धरना प्रदर्शन किया।  यह स्थिति कमोवेश प्रदेश के अन्य हिमालयी जनपदों जैसे- उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ व चंपावत में भी देखी जा रही है।

क्या है कीड़ाजड़ी

कोर्डीसेप्स साइनेन्सिस  यानी कीड़ा जड़ी उच्च हिमालय के बुग्यालों में 3000 से 6000 मीटर की ऊँचाई पर पाया जाने वाला एक फंगस प्रजाति है। इसका आधा आकार केटरपीलर या रेंगते हुए कीड़े जैसा होता है। इसके मस्तिष्क के केन्द्र पर एक काला तन्तु जैसा निकला रहता है। जो जमीन के ऊपर दिखता है लेकिन कीड़ानुमा भाग जमीन में धंसा रहता है जो बुग्याल की नम मिट्टी के अन्दर रहता है। बर्फ के पिघलने के साथ ही इस कीड़े जैसी जड़ से बाहर एक काला एवं भूरे रंग का एन्टीना जैसा निकल आता है। बुग्याल की घास के बीच बहुत ध्यान से देखने पर ही यह दिखाई देता है। उसके बाद इसे खोदकर सुरक्षित बाहर निकाला जाता है। ऐसी कीड़ाजड़ी जिसका जड़ एवं ऊपरी हिस्सा अलग-अलग हो जाए, उसका कम मूल्य मिलता है। यह फंगस या जन्तु कीड़े के बीज के सहजीवी संबंध को पेश करता है। बर्फ के पिघलने के साथ बुग्याल की घास तुरन्त बढ़ती नहीं है, इसलिए ऐसे समय में उत्तराखंड ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र के ग्रामीण अधिक से अधिक कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने के लिए अप्रैल माह से ही बुग्यालों में डेरा डाल लेते हैं। बाद में बरसात के मौसम में बुग्याल की घास में कीड़ाजड़ी ढूँढ पाना उसी तरह है जैसे कि भूसे के ढेर में सुई तलाशना।  
इस जड़ी के बनने की प्रक्रिया काफी रोचक है हालांकि प्रमाणित जानकारी का अभाव है। कुछ विशेषज्ञ बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों के चार से पांच हजार मीटर के अल्पाइन मिडोज (बुग्याल या घास के मैदान) में मोथ या पतंगा जैसे कीड़े अक्तूबर-नवम्बर में प्रजनन के बाद बुग्यालों में खुले रूप से अंडे छोड़ देते हैं। ये अंडे बाद में लारवा में बदल जाते हैं। ठीक इसी दौरान बुग्यालों में बर्फ पड़ जाती है, बर्फ के नीचे लारवा दबा रहता है। लेकिन बुग्याल की घास में मौजूद कुछ परजीवियों को लारवा भोजन के रूप में ग्रहण करता है, लेकिन ये परजीवी वापस धीरे-धीरे उसे ही  बर्फ के नीचे न्यूनतम तापमान में खत्म कर देते हैं और यह सूक्ष्म परजीवी लारवे के शरीर के आकार में परिवर्तित हो जाता है। (यानि ये परजीवी लारवे के शरीर के खोल में उसी ढाँचे में जमा हो जाते हैं, बाद में कीड़ाजड़ी का रूप धारण कर लेते हैं।) लेकिन जिन लारवों के शरीर में सूक्ष्म परजीवी नहीं होते वे अपना जीवन चक्र पूरा कर कीट में परिवर्तित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया अक्तूबर से अप्रैल तक चलती है।
स्थानीय लोग हिमालयी क्षेत्रों में इस महत्वपूर्ण जड़ी को निकालने का समय बर्फ पिघलने साथ ही शुरू करते हैं। मई से जून तक इन क्षेत्रों में इस जडी को निकाला जाता है। वर्षा ऋतु में यह जड़ी अत्यधिक बारिश के कारण सड़ जाती हैं, जिसे उपयोग में नहीं लिया जाता है। कीड़ाजड़ी को दोहन के बाद साफ करके हल्का सुखाया जाता है और उपयोग के लिए तुरन्त ही दवा बनाने वाले के पास पहुँचाना होता है। अन्यथा बिना कोल्ड स्टोर के इसे रखने पर यह भुरभुरी होकर अपघटित हो जाती है, इसका भार घट जाता है। ऐसा माना जाता है कि तब इसकी क्षमता या विशिष्ट गुण समाप्त हो जाते हैं।

कीड़ाजड़ी का आयुर्वेदिक या चिकित्सीय उपयोग
कीड़ाजड़ी का उपयोग कैंसर, हृदय रोग और त्वचा आदि की चिकित्सा पद्धति में किया जाता है। पुरूषों की यौन शक्तिवर्द्धक के रूप में यह सर्वाधिक प्रचारित-प्रसारित हुई है। जिसके कारण इसकी अंतर्राष्ट्रीय मांग के साथ-साथ इसका मूल्य भी लगातार बढ़ता जा रहा है। आज से पांच वर्ष पूर्व जहाँ कीड़ाजड़ी  का मूल्य 80 हजार से 1 लाख रुपये तक था वो बढ़कर 17-18 लाख रुपये हो गया है। प्राकृतिक वियाग्रा का स्थान पा चुकी कीड़ाजड़ी ने हिमालयी क्षेत्रों के गाँवों में जहाँ स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान दिया है।  
यूरोप तथा अमेरिकी देशों में इसकी मांग बढ़ती जा रही है। पर्यावरणविद् कहते हैं कि कीड़ाजड़ी के बारे में लिखित प्रमाण 15वीं शताब्दी में मिलता है। इसे यारसागुम्बा के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे केटरपीलर फंगस कहते हैं। वस्तुतः यह फंगस है। दुनियाभर में एस्कोमाइसीटी फंगस की चार सौ से अधिक प्रजाति पाई जाती हैं, जो प्रमुख रूप से भारत, चीन, नेपाल, भूटान, तिब्बत, जापान में उगती है। तिब्बत के प्रसिद्ध डा. जुरखार न्याम्नी दोरजे के परंपरागत चिकित्सा पद्धति के साहित्य में इसका सर्वाधिक लिखित प्रमाण मिलता है। तिब्बती चिकित्सा पद्धति में इसके सर्वाधिक उपयोग बताए गए हैं। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने से लेकर नपुंसकता के इलाज और यौवनवर्द्धक में इसका इस्तेमाल बताया गया है।  

कीड़ाजड़ी और बाजार
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रचार-प्रसार के अपने विशिष्ट गुणों की वजह से जहाँ कीड़ाजड़ी का अवैज्ञानिक दोहन बढ़ा है, वहीं दूसरी तरफ इसका मूल्य लगातार बढ़ता जा रहा है। चीन दुनिया में कीड़ाजड़ी का सबसे बड़ा बाजार है। जबकि नेपाल कीड़ाजड़ी संग्रहण और भारत से कीड़ाजड़ी के स्मगलिंग का महत्वपूर्ण पड़ाव कहा जाता है। यही नहीं एक डाक्यूमेंट्री में यह भी दिखाया गया कि किस प्रकार कीड़ाजड़ी के संग्रहण और व्यापार में नेपाल में माओवादी सक्रिय हैं और कीड़ाजड़ी संग्रहणकर्ताओं या बेचने वालों से स्वयं ही टैक्स वसूलते हैं।
1980 में एक किलो कीड़ाजड़ी का मूल्य चीन में 1800 यूआन था, वहीं 2013 में इसका मूल्य एक लाख 25 हजार से 5 लाख यूआन तक पहुँच गया है। 2012 में बीबीसी की रिपोर्ट में बताया गया कि एक कीड़ाजड़ी का मूल्य 150 रुपये यानि दो से तीन डालर जो भारत की सरकारी दैनिक मजदूरी से अधिक है। विश्व बाजार में सबसे कम गुणवत्ता वाली एक किलो कीड़ाजड़ी का मूल्य 3000 डॉलर तथा सबसे अधिक गुणवत्ता वाली जड़ी का मूल्य 18000 डॉलर है। उत्तराखंड में कीड़ाजड़ी का सरकारी समर्थन मूल्य 1 लाख 80 हजार रुपये प्रति किलो है। जबकि गैर सरकारी या तस्करी का मूल्य जो 2002 में 70-80 हजार रुपये प्रति किलो था और 2013 में 15 लाख रुपये प्रति किलो के आसपास था।
अकेले जनपद चमोली के डेढ़ सौ से अधिक गाँवों के 15 से 20 हजार परिवार प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से कीड़ाजड़ी संग्रहण और विपणन में जुटे हुए हैं। राज्य में  हर वर्ष लगभग 100 से 150 करोड़ का कीड़ाजड़ी का व्यापार हो रहा है। जिसका कोई लाभ भेषज संघ , वन विभाग, स्थानीय वन पंचायत और ग्राम पंचायत को नहीं हो रहा है। जहाँ एक ओर कीड़ाजड़ी लोगों की आर्थिक स्थिति को सुधारने में सहायक सिद्ध हो रही है, दूसरी तरफ अकेले जनपद चमोली के बुग्याली क्षेत्रों के गाँवों में कीड़ाजड़ी से जुड़े  विवाद बढने के समाचार अखबारों में जगह बना रहे हैं। यही नहीं जनपद पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, टिहरी से भी कीड़ाजड़ी व्यापार एवं संग्रहण से संबंधितविवाद बढ़ रहे हैं। जिसकी वजह से ग्राम पंचायत, वन पंचायत के झगड़े मारपीट की घटना भी बढ़ती जा रही है। यही नहीं उत्तराखंड सरकार व वन विभाग ने कीड़ाजड़ी के खुले व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया है। वन विभाग और भेषज संघ ने इसका मूल्य 1 लाख से 2 लाख के बीच में रखा है। इसलिए अधिकतर लोग इसका धंधा चोरी छिपे कर रहे हैं, क्योंकि तस्करी वाले बाजार में बेचने पर कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने वाले परिवार को 10 से 15 गुना अधिक मूल्य मिल जाता है। इसलिए ग्रामीण सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य या कागजी कार्यवाही में पड़ने की बजाय बुग्यालों में ही सौदा कर लेते हैं। जाहिर है कीड़ा जड़ी की तस्करी बिना मिलीभगत के नहीं हो सकती।  

यहां है कीड़ा जड़ी का खजाना
जोशीमठ क्षेत्र के बुग्याल- रीठा बुग्याल, गोरसों, काकभुषुंडि झील क्षेत्र, क्वांरीपास, खीरों घाटी, रक्तवन, नन्दा देवी बायोस्फियर के कोर जोन से लगे बुग्याल, घाट क्षेत्र में सात ताल, छतरकुड़ी, सिम्बे, मारखोली, कुटग्याल हद्यान, सप्तकुण्ड, नंदा खर्क, लम्ब पातल, लार्ड कर्ज़न पास के ऊपरी क्षेत्र के बुग्याल, पीपलकोटी बेमरू से ऊपर तोली ताल, पनार, मनपई, घियाविनायक और बण्डी धुर्रा,  बिरही घाटी में दुग्धकुण्डी क्षेत्र, देवाल में बेदनी बुग्याल और विनायक क्षेत्र में सर्वाधिक कीड़ाजड़ी पाई जाती है।

विवाद की वजह यह भी
वन पंचायतों के कानून के जानकार और स्थानीय निवासियों के हक-हकूकों की पैरवी करने वाले हेम गैरोला ने बताया कि सरकारी पहल के रूप में तीन-चार साल से कीड़ाजड़ी को लेकर अधिकारियों ने कई बैठकें कीं। कीड़ाजड़ी एल्पाइन क्षेत्र में उगती है, जो खर्क और छानियों से ऊपर है। उन्होंने बताया कि वन एवं ग्राम्य विकास आयुक्त के कार्यवृत्त में यह स्पष्ट लिखा गया है कि जिन एल्पाइन क्षेत्रों में कीड़ाजड़ी होती है, उन्हीं के पास के वन पंचायत को स्पष्ट रूप से चिन्हित करके कीड़ाजड़ी  संग्रहण के लिए परमिट एवं क्षेत्र वहाँ के ग्रामीणों की सहमति पर दिया जाना चाहिए, लेकिन प्रमुख वन संरक्षक के आदेश में यह लिख दिया गया है कि परमिट वन पंचायत जारी करेगी।  यानि इस आदेश के अनुसार ऐसे गाँव की वन पंचायत भी परमिट जारी कर सकती है जिसका कोई एल्पाइन जंगल या बुग्याल है ही नहीं। यही वजह है कि कीड़ाजड़ी को लेकर बाहरी गाँव और भीतरी गाँव का विवाद बढ़ता जा रहा है।

कीड़ाजड़ी संग्रहण और ग्रामीण विकास
मार्च माह के समाप्त होने के साथ ही जुलाई तक उच्च हिमालयी क्षेत्रों के गाँवों जैसे- जोशीमठ ब्लाक  में मोल्टा, दाड़िमी, गणाई, पल्ला, डुमक कलगोठ, जखोला, उर्गम, सलना, टंगणी, पैनी, सलूर डुंग्रा, बड़ा गाँव, करछौं, तुगासी, सलधार, वल्ली रैणी, सुभांई, बचुरा, चांचड़ी, लाता, सुराई थोटा, पैंग, मुरूंडा आदि, दशोली के स्यूंण, बेमरू, पाणा, ईराणी, झींझी, दुर्मी, पगना, सग्गर गंगोल गाँव, मंडल आदि तथा  घाट ब्लाक के कासखण्ड के बेरास कुण्ड, कांडई, भेंटी, बंगाली, सुतोल, कनोल, गुलाड़ी, कुरूड़, पेरी आदि गाँवों के अधिकतर परिवार बुग्यालों में कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने जा रहे हैं। घरों में बुजुर्ग, छोटे बच्चे और कुछ महिलाएं ही रह जाते हैं।
 हालांकि ऊँचे बुग्याल क्षेत्रों में जहाँ तापमान कभी-कभी सामान्य से माइनस 20 डिग्री सेंटीग्रेड भी हो सकता है। वहाँ कम सुविधाओं के साथ रहकर कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने का काम आसान नहीं है। तेज तूफानी, बर्फीली हवाओं और हिमखंडों के एवलांच और दुर्गम स्थानों पर कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने का लालच कई युवाओं को असमय मौत के मुँह में धकेल चुका है। वहीं दूसरी ओर इस दौरान गाँव के विकास कार्य और योजनाओं का क्रियान्वयन बिल्कुल ठप पड़ जाता है। कीड़ाजड़ी के संग्रहण के समय पर मनरेगा, जड़ी-बूटी कृषिकरण, सरकारी व गैर सरकारी विभागों और संस्थाओं की योजनाएं मानव श्रम के अभाव में ठप पड़ जाती हैं।
कीड़ाजड़ी संग्रहण और बच्चों की भूमिका
कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की लालसा में उच्च हिमालयी क्षेत्र के गाँवों में 12-13 साल से बड़े बच्चों को भी कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने के काम में लगा रहे हैं। हाड़ कंपा देने वाली ठंड में बच्चे बुग्यालों में ही परिवारों के साथ जाने लगे हैं। एक आंकड़े के अनुसार इस दौरान ऊँचे क्षेत्रों में स्थित गाँवों के सातवीं आठवीं से आगे की कक्षा के छात्रों की उपस्थिति ( जून में ग्रीष्म अवकाश भी रहता है) काफी कम रहती है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।
कीड़ाजड़ी व्यापार का पर्यटन प्रभाव
उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश के रूप में प्रचारित-प्रसारित करने के बावजूद यहाँ की टूर-ट्रैवल एजेंसियों को ट्रैकिंग के वक्त स्थानीय गाइड एवं पोर्टर मिलने मु्श्किल हो गए। जोशीमठ व गोपेश्वर में व्यावसायियों से हुई वार्ता के अनुसार आजकल ऊँचाई वाले गाँवों जैसे- घाट, दशोली व जोशीमठ के लगभग सभी ग्रामीण सारे काम-धाम छोड़कर बुग्यालों में (पनार, मनपई, औली, गोरसों, बेदनी) चले गए हैं। उन्हें अब पुनः पोर्टरों और गाइडों के लिए नेपाल से आए मजदूरों पर निर्भर होना पड़ रहा है। राज्य में शुरुआत में कीड़ाजड़ी और झूला (लाइके़न जो बांज के पेड़ों से निकलता है) इकट्ठा करने का काम यहाँ रोजगार की तलाश में नेपाल से आने वाले मजदूर ही करते थे।
रोजगार के साथ दुष्प्रभाव भी
यह सच है कि कीड़ाजड़ी के बाजार और विपणन व्यवस्था में जहाँ एक ओर ग्रामीणों के पास एक नया लेकिन कठिन और अधिक पैसे देने वाला अल्पकालिक रोजगार का विकल्प विकसित हुआ है वहीं इसके कई दुष्प्रभाव भी दिखाई दे रहे हैं। सरकार या वन विभाग की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। प्रदेश के शोध संस्थान कीड़ाजड़ी संरक्षण के लिए खास प्रयास नहीं कर रहे हैं। अगर शोध हो भी रहे हैं तो वे जनसुलभ नहीं हैं। वन पंचायतों के माध्यम से कीड़ाजड़ी संग्रहण और उसका भेषज संघ से विपणन विवादास्पद है। जहाँ वन पंचायतों के अधिकार क्षेत्र नहीं हैं, जैसे- रिज़र्व फारेस्ट, नेशनल पार्क और बायोस्फ़ियर वहाँ वन पंचायतों की भूमिका तय कर एक बेईमानी प्रक्रिया थोपी जा रही है। प्रदेश के कुछ दबंग कीड़ाजड़ी व्यापार में दखल रखते हैं।  हाँ, सुखद यह है कि साल भर में स्वतः खत्म हो जाने वाला कीड़ाजड़ी या कोर्डिसेप्स कई परिवारों के लिए कई सालों की आमदनी का सशक्त विकल्प उभरकर सामने आया है।

  • लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण व स्वरोजगार के लिए काम कर रहे आगाज फैडरेशन के अध्यक्ष हैं।

The future crop for cash economy and employment in Himalaya.
The future crop for cash economy and employment in Himalaya.

Industrial hemp –  big resource for Himalayan Economy

भांग को बदनाम ना करो , ये बड़े काम की चीज

1-JP pp

जेपी मैठाणी

गढ़वाल के जिलों (वर्तमान का पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़) में रेशे और मसाले के लिए भांग की व्यावसायिक खेती की अनुमति का प्रावधान है। उस समय जब जूते, चप्पलों का प्रचलन नहीं था, तब भेड़-बकरी पालक और तिब्बत के साथ व्यापार करने वाले लोग भेड़-बकरी की खाल से बने जूतों के बाहर भांग की रस्सी से बुने गए छपेल इस्तेमाल करते थे। ये जूते पैर गर्म रखते थे और बर्फ में फिसलने से रोकते थे। भेड़-बकरियों की पीठ पर माल ढोने के लिए भांग के रेशों से बनाए गए थैले भी पुराने समय में प्रचलन में थे। उत्तराखंड के स्थानीय संसाधनों का वर्णन करते हुए ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी यहां के प्राकृतिक संसाधनों जैसे परंपरागत फसलों, प्राकृतिक रेशे डांस कंडाली, भांग और अन्य रेशों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

इन में से एक गढ़वाल हिमालय के गजेटियर में वर्णन किया गया है-लिखते हैं, चंदपुर में खसिया-पबिला अब भांग उगाते हैं। वे भांग गाँव से लगे उपजाऊ खेतों में उगाते हैं। पहले वे जंगलों को काटकर उसमें भांग बोते हैं। लेकिन इससे चूंकि जंगल को नुकसान होता था इसलिए इस परम्परा को हतोत्साहित किया गया।भांग के हरे तने काटकर उन्हें धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद उनके बंडल बनाकर पंद्रह-सोलह दिन के लिए पानी में डुबो दिया जाता है। इसके बाद बंडलों को लकड़ी के मुदगर से पीटकर फिर धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद रेशे (लम्फा) निकाले जाते हैं। ये रेशे इसके मोटे वाले कोने से उधेड़ने शुरू किए जाते हैं और फिर कूटकर इसकी गर्द निकालकर इसके पुलिंदे बनाए जाते हैं। ताकि इसे बेचा जा सके या इससे वस्तुएं बनाईं जा सकें। इससे कपड़ा बनाया जाता है, जिसे भंगेला कहते हैं। इसे चांदपुर के लोग आमतौर पर पहनते हैं या थैले बनाते हैं। इसका कोटद्वार और रामनगर के रास्ते थोड़ा बहुत निर्यात होता है।

यही नहीं गढ़वाल हिमालय के गजेटियर में यह भी जिक्र किया गया है कि भोटिया समाज के लोग ऊन के साथ-साथ भांग के बने कपड़े भी पहनते हैं। स्थानीय तौर पर कम्बल और भांग के रेशे का व्यापार किए जाने का जिक्र भी है। घी के व्यापार के साथ-साथ प्राकृतिक रेशे का व्यापार परम्परागत रूप से उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में डेढ़ सौ वर्ष से भी पहले का बताया गया है। महान इतिहासकार हिमालय प्रेमी एटकिंसन द हिमालयन गजेटियर के भाग एक में उत्तराखण्ड में भांग की खेती आधारित स्वरोजगार के बारे में लिखा है कि भांग की प्रजाति कैनाबिस इंडिका में नर और मादा पौधे अलग-अलग होते हैं। नर पौधे को फूल भांग और मादा पौधे को गुर भांग कहते हैं। लम्बे-लम्बे गोल डंठलों की ऊपरी त्वचा से ही भांग के रेशे का उत्पादन होता है। ये बारिक रेशे क्यूटिकल नामक त्वचा से ढ़के रहते हैं। भांग का रेशा अधिकतर नर पौधे से प्राप्त होता है यानि मादा पौधे से रेशा कम निकलता है। जबकि बीज और नशीला पदार्थ मादा पौधे से निकलता है।भांग के बीज का उपयोग तेल निकालने और मसाले के रूप में किया जाता है। नर पौधे से निकलने वाले रेशे को भंगेला कहते हैं। भांग के रेशे का उपयोग कोथला, बोरा, गाजी और पुलों के लिए रस्सी बनाने में उपयोग किया जाता है। कहीं-कहीं इन्हें गनरा-भांग, बण भांग, जंगली भांग भी कहते हैं। यह हिमालय के उत्तर-पूर्व जनपदों में उगाई जाती है। 

एटकिन्सन लिखते हैं कि इस प्रोविन्स में भांग की खेती की डॉ. राक्सबर्ग ने लिखा है  क्षेत्र में भांग की खेती को बढ़ावा देने के लिए यूरोप से भांग की खेती के विशेषज्ञ मुरादाबाद और गोरखपुर जिलों में लाए गए थे और कई वर्षों तक ईस्ट इंडिया कंपनी अपने वार्षिक निवेश का बड़ा हिस्सा कुमाऊं की पहाड़ियों में उगाए गए भांग के एवज में प्राप्त करती थी। लेकिनलिखा है  क्षेत्र में भांग की खेती को बढ़ावा देने के लिए यूरोप से भांग की खेती के विशेषज्ञ मुरादाबाद और गोरखपुर जिलों में लाए गए थे और कई वर्षों तक ईस्ट इंडिया कंपनी अपने वार्षिक निवेश का बड़ा हिस्सा कुमाऊं की पहाड़ियों में उगाए गए भांग के एवज में प्राप्त करती थी। लेकिनमें भांग की खेती को बढ़ावा देने के लिए यूरोप से भांग की खेती के विशेषज्ञ मुरादाबाद और गोरखपुर जिलों में लाए गए थे और कई वर्षों तक ईस्ट इंडिया कंपनी अपने वार्षिक निवेश का बड़ा हिस्सा कुमाऊं की पहाड़ियों में उगाए गए भांग के एवज में प्राप्त करती थी। लेकिन बाद में कंपनी के उन्मूलन और बहिष्कार के साथ भांग के रेशा आधारित कपड़ों की मांग सिर्फ स्थानीय स्तर पर ही रह गई थी।

यही नहीं हिमालयी क्षेत्र में भांग की खेती के संदर्भ में हडल स्टोन और बेटन्स ने भी महत्व्पूर्ण बातें लिखी हैं। गढ़वाल में बड़े पैमाने पर भांग की खेती पूर्व में 4000 से 7000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्र- बधाण, लोहबा, चाँदकोट, चाँदपुर, धनपुर, और देवलगढ़ परगने में किए जाने का जिक्र है। ये क्षेत्र अपनी विस्तृत वन सीमाओं, घने जंगल और समान तापमान की वजह से भांग की खेती के लिए उस दौर में अनुकूल थे जबकि उत्तरी दिशा के परगने जो हिमालय की बर्फीली चोटियों से मिलते थे, वहाँ भांग की खेती बहुत कम थी। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गढ़वाल में भांग के उत्पादन का सर्वथा अनुकूल क्षेत्र उत्तर में पिंडर, दक्षिण में नयार, पूर्व में पश्चिमी रामगंगा और पश्चिम में गंगा नदी के बीच स्थित था। उस दौर में प्रति बिस्सी/ बिसवा जमीन (1 बिस्सी बराबर 45 वर्ग गज) में 20 से 25 पाथा या 52 से 66 पाउंड भांग के बीज बोए जाने का जिक्र किया गया है। उस दौर में भी भांग की खेती के लिए जमीन को साफ करके मई-जून में बीज बोये जाने का जिक्र है। हिमालयन गजेटियर में भांग की खेती का दस्तावेज़ीकरण 210 साल से भी पुराना है। दस्तावेज़ों में खेती करने के तरीके, कटाई, रेशा निकालना और मोटा कपड़ा बनाने की प्रक्रिया को विस्तारपूर्वक बताया गया है। यह कहा गया है कि गरीब लोग गर्मियों में भी भांग के भंगेला वस्त्र पहनते थे।

कुमाऊं में चैगरखा विशेषकर लखनपुर, दारूण, रांगौर और सालम पट्टी में भांग की खेती की जाती रही है। गंगोलीहाट के बरौं अस्सी चालिसी, ऊच्यूर, गुमदेश, ध्यानीराव और मल्ला चैंकोट में भांग की वृहद् खेती किए जाने वर्णन है। एटकिन्सन लिखते हैं कि गढ़वाल में भांग की खेती करने वालों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था और- ‘तेरे घर-खेत में भांग जम जाए‘ ऐसा कहना अपशब्द माना जाता था। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोग बिना जाति मोह की चिन्ता किए सतत रूप से भांग उगाकर उनके रेशों से घरेलू उपयोग के लिए रस्सियां बनाते हैं। यही नहीं वे भांग के रेशे से बने थैलों का उपयोग करते थे।
एटकिन्सन लिखते हैं कि डा. रदरफोर्ड ने भांग के रेशे के लिए ईस्ट इण्डिया कंपनी से करार किया था और इस वक्त ही उत्तराखंड में भांग रेशा आधारित उद्यमिता की शुरुआत हुई जो कि गांव के मुखिया के माध्यम से की जाती थी। 1814 में 4 रुपये में एक मौंड (320 पौंड) रेशे की कीमत किसान के घर पर 4 रुपये और कोटद्वार या चिल्किया में 5 रुपये प्रति मौंड बताई गई। यानि लगभग 128 किग्रा रेशे की कीमत सन् 1814 के आसपास मंडियों में 5 रुपये और किसान के घर पर 4 रुपये थी। सन् 1840 में कुमाऊं क्षेत्र से हजार रुपये से थोड़ा अधिक धनराशि का भांग रेशा और भांग से बने उत्पादों का व्यापार हुआ था। कैप्टन हडल्सटन ने अनुमान लगाया था कि गढ़वाल क्षेत्र में उसी दौरान 250 एकड़ से 40 टन रेशा पैदा हुआ होगा। इस दौर में भांग के बीजों को सौर एवं सीरा परगना में खाने के लिए प्रयोग किया जाता था। सन् 1840 में भांग का ज 3 रुपया प्रति मौन्ड (320 पौण्ड) था जो बाद में 4 रुपया हो गया था इस दौर में भी लोग बिना बुने हुए भांग के रेशे अपने उपयोग के अनुसार खरीदते थे। 

भंगेला या भांग का कपड़ा सीट के रुप में और या तो कोटला (मोटा कपडा) और थैले के लिए उपयोग होता था जबकि बारिक काते गए भांग के धागे से आटा और चूना लाने लेजाने के लिए थैलियां बनाई जाती थीं। सन् 1840 में भांग के कपड़े का बैग 6 आना और सन् 1881 में 12 आने में बेचा जाता था छोटे साइज के बैग सन् 1840 में 2 रुपये दर्जन होते थे। भांग के कपडे़ से बने थैलों की मांग व्यापारियों द्वारा लगातार बढ़ती जा रही थी मांग का फायदा उठाते हुए भांग के कपड़े बने थैले महंगे होते जा रहे थे। क्योंकि कोटद्वार और रामनगर के तराई में आलू बेचने के लिए इन थैलों का प्रयोग किया जा रहा था।

मिस्टर जेएच बैटन ने अपनी रिपोर्ट- कुमाऊं में भांग की खेती की संभावनाए शीर्षक में लिखा है कि कुमाऊं के चैगरखा परगना में और सम्पूर्ण कुमांऊ में जो भी परिवार भांग की खेती कर रहे हैं उन्हीं से भांग का रेशा खरीदा जाए बजाय यूरोपीय राजधानी के नुमांइदें यहाँ आकर जमीन खरीदें और फिर भांग की खेती को उद्यमिता विकास के लिए प्रोत्साहित करें। यहां यह समझना बहुत आवश्यक होगा कि- ‘मैं समझता हूँ जब भांग के रेशा आधारित उद्योग से कोई भी परिवार रोजगार पा रहा हो और उसका जीवनस्तर बेहतर दिखाई देने लगे तो उत्तराखंड के समाज में अन्य लोग स्वयं इसका अनुसरण करेंगे। जिससे सम्पूर्ण कुमाऊं और गढ़वाल की वो सारी जमीन धीरे-धीरे भांग की खेती के लिए उपयोग की जा सकेगी। जो अभी तक बेनाप और बेकार पड़ी हुई है।

नेपाल में भांग की खेती-
इसी दौर में नेपाल के उत्तरी परगना में भी भांग की खेती की जाती थी। मिस्टर बीएच हागसन ने लिखा है कि नेपाल में मार्च अप्रैल में भांग के बीज बोए जाते हैं। खेत को समतल कर पर्याप्त मात्रा में गोबर डाला जाता है। बाद में भांग के बीजों को छिड़ककर बोया जाता है जो कि बोने के 7-8 दिन बाद जमने लगते हैं। वो लिखते हैं कि भांग के पौधों पर सावन यानि जुलाई और भादो यानि अगस्त की शुरुआत में फूल और बीज बनने लगते हैं। इसी दौरान जिन पौधों पर बीज ना बने हों उन्हें काटकर उनकी छाल से कोमल रेशा निकलता है। और इस रेशे से कोमल कपड़े या भंगीला (भांग से बने कपड़े) बनाए जाते हैं। जबकि जिन पौधों को फूल और बीज बन जाने के बाद अक्टूबर में काटा जाता है, उनके डंठलों को 8 से 10 दिनों तक तेज धूप में सुखाया जाता है फिर उन गट्ठरों को तीन दिन तक बहते पानी में डुबोकर रखा जाता है और चौथे दिन उनकी छाल निकालकर, धोकर अच्छे ढंग से सुखाया जाता है इस तरह से अब प्रत्येक छाल बारीक-बारीक छिलकर उसके रेशे हाथ के नाखूनों से अलग करते हुए तकली (टिकुली) से घुमाते हुए धागा तैयार कर लिया जाता है।

इस धागे को लकड़ी की राख और पानी के घोल में 4 घंटे तक उबाला जाता है। इसके बाद पुनः अधिक सफेदी लिए धागा तैयार होता है। नेपाल में उस दौर में भांग के कपड़े और थैले बनाने का यह तरीका मौजूद था। वे आगे लिखते हैं कि एक माणा यानि कच्चा सेर का आधा बीज एक रोपणी (भूमि माप का पैमाना जो कि 605 वर्ग गज के बराबर होता है) भूमि से 10 या 12 लोड भांग पैदा होता है। यूरोप के बाजारों के लिए उस दौर में तैयार किए जाने वाले भांग रेशे के वे समस्त गुण जैसे मज़बूती, महीन, कोमल और जोड़ों पर ना दिखने वाला प्राकृतिक रेशा उत्तराखंड और नेपाल के भांग रेशों में पीट्सवर्ग में उगाये जाने वाले भांग के उन्नत गुणों के समान था।
ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को सामने लाना इसलिए भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि 15 साल पहले बने हिमालयी राज्य में स्थानीय संसाधन आधारित स्वरोजगार जो प्रदूषण नहीं करते हों विकसित किए जाने की आवश्यकता है। पर्यटन (इकोटूरिज़्म), प्राकृतिक रेशा और हस्तशिल्प -ये तीन प्रमुख रोजगार के उद्योग हैं, जो धुंआरहित हैं। यहाँ यह भी स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि इस लेख का प्रमुख उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ भांग के रेशा, दवा, कास्मेटिक, कागज़, इन्सुलेशन, ऊर्जा के उपयोग वाले क्षेत्रों को प्रोत्साहित करना है।

बांबे हैम्प कंपनी के अध्ययन के अनुसार –
आबकारी अधिनियम की धारा 8/9/10 में भांग में पाए जाने वाले नशीले नारकोटिक्स की वजह से प्रतिबन्धित और खेती करने का भी प्रावधान है। वहीं दूसरी ओर धारा 14 में आबकारी अधिकारियों के निरीक्षण और मार्गदर्शन में भांग की खेती किए जाने का प्रावधान है। अगर व्यावसायिक भांग में टीएचसी स्तर 0.3 से 1.5 के बीच है तो ऐसी भांग नशे की श्रेणी में नहीं आती है लेकिन जहाँ टीएचसी का स्तर 1.5 से अधिक हो जाए उसे नशीला माना जा सकता है और ऐसे भांग की खेती प्रतिबंधित हो जाएगी। अब इस दिशा में राज्य सरकार के आग्रह पर पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय, भरसार कृषि विश्वविद्यालय, विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान भांग की उन्नत किस्म जो रेशे और बीजों के लिए उपयोगी हो और जिसमें टीएचसी का स्तर 0.3 से कम होगा, ऐसे बीजों को पहाड़ों की बेकार पड़ी भूमि पर कृषिकरण के लिए प्रचारित प्रसारित किया जाएगा।

वन पंचायतों पर कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता ईश्वर जोशी बताते हैं कि 1992-93 में भी स्थानीय लोगों द्वारा परम्परागत रूप से भांग की खेती को नारकोटिक एक्ट से मुक्ति दिलाने के लिए एक समिति बनाई गई थी लेकिन उस वक्त भी उस पर कोई खास कार्य नहीं हो पाया। उनका कहना है कि भांग की खेती नशे के लिए करना सर्वथा अनुचित है, लेकिन अगर भांग के रेशे और बीज का उपयोग स्थानीय स्वरोजगार को बढाने के लिए किया जाए तो अनुचित नहीं है। कुमाऊं में पुरातन काल से ही भांग के बीजों का उपयोग गडेरी, गोभी की सब्जी में मसाले के रूप में सर्वाधिक किया जाता रहा है। ग्रामीणों क्षेत्रों के गरीब काश्तकार भांग के बीज, नमक और नींबू की चटनी बनाकर ही सब्जी का जुगाड़ कर लेते हैं। मट्ठे को स्वादिष्ट बनाने के लिए भांग के थोड़े से बीज, टिमरू के बीज पीसकर स्वादिष्ट पेय बनाया जाता रहा है।

उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद के वरिष्ठ कार्यक्रम समन्वयक  दिनेश जोशी ने जानकारी दी कि हिमालय में तिब्बत और भूटान्तिक व्यापार के दौरान से ही भांग के रेशे से बने छपेल (बर्फ पर चलने के लिए जूते), रस्सियां, छोटे थैले, बैलों के मुंह पर बांधे जाने वाले मोथड़े भांग से ही बनाए जाते रहे हैं। ऐसे में कुछ लोगों का बिना सोचे-समझे भांग की खेती के प्रोत्साहन का विरोध करना सर्वथा अनुचित है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद ने राज्य बनने के बाद सबसे पहले 2004 में पीपलकोटी में आगाज़ फैडरेशन के साथ भांग रेशा आधारित प्रशिक्षण एवं प्रसंस्करण कार्यक्रम चलाए गए, जिसकी सफलता को देखते हुए सर रतन टाटा ट्रस्ट ने कार्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। आज भी यह कार्य भांग रेशे के साथ-साथ कण्डाली और भीमल रेशा आधारित उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए आगाज़ फैडरेशन पीपलकोटी बिना किसी सहायता के चला रहा है। यहाँ भांग के रेशे के सदुपयोग पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है ना कि उसके नशीले गुणों को उजागर कर डांडी मार्च करने की।

जनपद चमोली में ही डांस कण्डाली परियोजना पर आगाज़ फैडरेशन के साथ कार्य कर रहे विमल मलासी ने बताया कि भांग के रेशे की खेती को प्रोत्साहित करने से गाड़-गधेरों और बुग्यालों से नीचे छानी क्षेत्र में जहाँ भेड़-बकरियों को गोठ में रखा जाता है, उस खाली जमीन पर जो भांग उगती है उसका नशे के लिए दुरूपयोग संभव है लेकिन अगर सही देख-रेख में कम टीएचसी लेवल की भांग की खेती कर उससे फाइबर निकाला जाए तो सैकड़ों बेरोजगारों को रोजगार मिल सकता है। भारतीय ग्रामोद्योग संस्था के अनिल चंदोला ने जानकारी दी कि उनके कार्डिंग प्लांट में भांग-कण्डाली, ऊन आदि सभी रेशों की कार्डिंग की जाती है और भांग से बने धागे की देश-विदेश में बहुत मांग है।

बाम्बे हैम्प कम्पनी से जुड़े युवा दिलज़ाद और सुमित ने बताया कि अकेले भारत में भांग के रेशे, भांग के बीजों का तेल, भांग के बीजों से बने साबुन और भांग का रेशा निकालने के बाद बचे बायोमास या डण्ठलों से – भवन निर्माण सामग्री, इंसुलेशन पैनल, मोटर कार के बम्पर बनाने के शोध कार्य आगाज़ फैडरेशन के साथ तीन साल से किए जा रहे हैं। इसलिए हमें इस बात की निराशा है कि  कुछ लोग सिर्फ नशा और लाइसेंसिग की प्रक्रिया का शोर मचाकर इस विकास कार्य को प्रभावित करना चाहते हैं।
नारकोटिक्स एक्ट 1985 के सेक्शन 14 में वर्णित है कि सरकार विशेष प्रावधानों के तहत सिर्फ और सिर्फ भांग के औद्योगिक उपयोग जैसे रेशा, बीज और उद्यानिक प्रयोग के लिए भांग की खेती कर सकते हैं। एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग एण्ड साइकोट्रापिक सब्सटेन्सेस) एक्ट 1985 पर राष्ट्रीय नीति के सेक्शन 14 में पुनः इसका उद्धरण है कि भांग के बीजों से उच्च मूल्यों के तेल बनाए जा सकते हैं। कुछ देशों में भांग की कम टीएचसी (टेट्रा हाइड्रा कैनाबिनोल) की प्रजाति उगाई जा सकती है। उत्तराखण्ड के संदर्भ में अल्मोड़ा, गढ़वाल और नैनीताल- तराई भाबर को छोड़कर एनडीपीएस एक्ट के सेक्शन 17 (1) (बी) आबकारी एक्ट के तहत भांग के कृषिकरण की अनुमति प्रदान है यानि अल्मोड़ा, गढ़वाल और नैनीताल में भांग की खेती की जा सकती है। लेकिन भांग का किसी भी स्थिति में नशे के लिए कदापि उपयोग नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय द्वारा डा. सलिल के तिवारी के निर्देशन में डा. अलका गोयल, डा. आशुतोष दुबे, डा. एके वर्मा, डा. शिशिर टंडन और डा. सुमित चतुर्वेदी के नेतृत्व में 2011 से उत्तराखंड में कम टीएचसी की भांग प्रजाति की कृषिकरण और रेशे के बेहतर उत्पादन के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इससे पहाड़ के ऊँचाई वाले इलाकों में चरस गांजा के लिए उगाई जाने वाली भांग की अवैध खेती को रोका जा सकेगा।

हाल ही में देहरादून स्थित बीजापुर अतिथि गृह में तीर्थ एवं पर्यटक स्थलों पर प्लास्टिक पालिथीन प्रतिबंधित कर भांग, भीमल, डांस कंडाली, रामबांस, भाबड़ घास से बने हस्तशिल्प उत्पाद रखने के निर्देश दिए गए। मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि गाँव में प्राकृतिक संसाधन होने से पलायन रूकेगा और उनका प्रयास रहेगा कि देश-विदेश के सभी संस्थानों को इस कार्य में जोड़ कर राज्य में विकास के नए आयाम स्थापित किए जाएं।

  • लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और आगाज फैडरेशन के अध्यक्ष हैं।