भाजपा प्रदेश अध्यक्षः मैदानी क्षेत्र जा सकता है ओहदा

0
584

कुमाऊं और गढ़वाल के बीच जातीय संमवन्य बनाए रखने का अब रहा है फार्मूला

देहरादून। प्रदेश भाजपा के ऩए अध्यक्ष का चुनाव शीघ्र ही संभावित है। ऐसे में भाजपा के सामने इस प्रदेश में लंबे समय से चले आ रहे जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को साधना एक बड़ी चुनौती है। तमाम सियासी हालात और संतुलन को साधने पर गौर करें तो लग रहा है कि इस बार भाजपा जातीय संतुलन की बजाय क्षेत्रीय संतुलन को बनाने की कोशिश में है। अगर ऐसा होता हो तो प्रदेश अध्यक्ष का पद राज्य के मैदानी हिस्से में जा सकता है।

राज्य गठन के बाद से ही दोनों प्रमुख सियासी दलों भाजपा औऱ कांग्रेस के सामने कुमाऊं और गढ़वाल के बीच जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की चुनौती रही है। सीधा सा फार्मला रहा है कि मुख्यमंत्री अगर गढ़वाल का ब्राह्मण नेता है तो प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊं का ठाकुर नेता होगा। इसी तरह अगर विपक्ष का प्रदेश अध्यक्ष गढ़वाल का ठाकुर है तो नेता प्रतिपक्ष कुमाऊं का ब्राह्मण होगा। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल अब तक इसी तरह संतुलन साधते रहे हैं।

इस समय सत्ता पक्ष की ओर से मुख्यमंत्री का पद गढ़वाल के ठाकुर नेता के पास है तो प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊं के ब्राह्मण नेता के पास है। मुख्यमंत्री बदलने की अभी कोई संभावना नहीं है, ऐसे में भाजपा को प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए कुमाऊं का ब्राह्मण नेता चाहिए। 15 दिसंबर तक नए प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होना है। इस बार भाजपा के लिए ऩए सिरे से संतुलन साधने की चुनौती है। पहली बात तो इस समय भाजपा के पास कुमाऊं में इस कद का कोई ब्राह्मण नेता नहीं है। फिर भाजपा को इस वक्त मैदानी क्षेत्र की उपेक्षा की बात अंदरखाने झेलनी पड़ रही है।

इसकी बड़ी वजह यह है कि हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर की मैदानी क्षेत्र की दोनों लोकसभा सीटों पर पर्वतीय मूल के नेता काबिज हैं। फिर राज्यसभा की सभी सीटें भी पर्वतीय लोगों के पास है। मुख्यमंत्री भी पर्वतीय हैं और कैबिनेट में महज एक अरविंदं पांडेय (कुमाऊं) और मदन कौशिक (गढ़वाल) ही मैदानी मूल के हैं। इसके अलावा मैदानी क्षेत्र की जनसंख्या भी पर्वतीय क्षेत्र की तुलना में काफी है।

2026 में प्रस्तावित नए परिसीमन में मैदानी क्षेत्र में विस सीटों की संख्या पांच तक और बढ़ सकती है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा का थिंक टैंक इस मुद्दे पर शिद्दत से मंथन कर रहा है कि कहीं ये हालात मैदानी क्षेत्र की उपेक्षा का माहौल न बना दें। बताया जा रहा है कि भाजपा इस बार जातीय संतुलन की बजाए क्षेत्रीय संतुलन पर फोकस कर सकती है। मैदानी मूल के एक नेता ने तो संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों के सामने इस मुद्दे पर बेहद मुखर अंदाज में मैदानी क्षेत्र से ही अध्यक्ष बनाने की पुरजोर पैरवी भी की है। संघ पदाधिकारियों को बताया गया है कि मैदानी मूल के लोग किस तरह से खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं और इस बार प्रदेश अध्यक्ष पद पर मैदान का ही दावा बनता है।

ये नेता हो सकते हैं दावेदार
बलराज पासीः 1991 के लोस चुनाव में कांग्रेसी दिग्गज एनडी तिवारी को पराजित कर चुके हैं। प्रखर वक्ता हैं और विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जु़डे रहे। राम जन्मभूमि आंदोलन में हिस्सा लिया। जेल भी गए हैं। 1991 के बाद से भाजपा ने इन्हें दावेदारी के बाद भी किसी भी चुनाव में टिकट नहीं दिया।

विश्वास डाबरः संघ से गहरा रिश्ता रहा है। पूरा परिवार आरएसएस से जुड़ा है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता भी रहे हैं। अटलजी समेत भाजपा और संघ के प्रमुख पदाधिकारियों का इनका परिवार खासा नजदीकी रहा है। आर्थिक रूप से भी संपन्न हैं।

अरविंद पांडेयः वर्तमान में कैबिनेट मंत्री हैं और शुरुआती दौर से ही संघ पृष्ठभूमि के रहे हैं। राज्य के मैदानी क्षेत्र में खासी पकड़ रही है। राष्ट्रीय सह महामंत्री संगठन शिवप्रकाश के नजदीकी हैं।

LEAVE A REPLY