चिनार प्रेम

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अनीता मैठाणी

चिनार के दरख़्त से
पत्तियों के झरने का मौसम हो जैसे,
खुद चिनार सी हो जाती हूँ।
कभी हरे पत्तों सी ताजगी लिए
फिर कभी उदास हो पीले रंग में रंग जाती हूँ
फिर धीरे से पीले रंग में पगी हुई
बैंजनी सी रक्तिमा ओढ लेती हूँ।

प्रेम सी झरूँगी, हाँ झरूँगी एक रोज,
मुरझाकर नहीं, लहराकर बडे़ नाज से
कहते हुए…
आऊँगी, हाँ आऊँगी फिर एक रोज
तुम्हारे बुलाने पर,
बस आवाज़ लगा देना
बड़े प्यार से चिनार कहना।

अजन्मा हूँ,
फिर भी बार-बार जन्म लूँगी, कि;
वादा है तुमसे बुलाने पर आने का …
बहुत सा हरा-पीला-लाल-बैंजनी समेटे
बार-बार आऊँगी
तुम बुलाते रहना, सुना तुमने,
बड़े प्यार से चिनार कहना…

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