फिर भी

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उमेश राय

सघन अँधेरा बढ़ रहा है,
अपने तिलिस्मी रंग-रुप में..
विश्वास की आस टूटती जा रही है,
कच्चे धागे की मानिंद .

बहुरुपिया लोग बढ़ रहे हैं नित नए अंदाज में,
जैसे खेत में खरपतवार बिना बोये ही निकल आती है.
संबंध की गंध लुप्तप्राय होकर अनुबंध की गंधहीनता में हो गयी है परिणत,
जैसे फूल-फल से रहित शुष्क रूख पड़ा हो.

जितना है, वह कम है,
यह अभाव का भाव उग गया है,
कंटीले नागफनी जैसा यत्र-तत्र-सर्वत्र.
एक बेबसी, बेचैनी, भय, अकेलापन पसरा है दूर-दूर तक,
इतना कि खुद से भी बहुत दूर हो गया आदमी.

खाली आश्वासनों से पेट नहीं भरा करता,
दिल तो बिल्कुल नहीं.
इतने अनर्थकारी,अवमूल्यित होते समय में भी,
तुम रोशनी बोते रहना छोटा ही सही,

मूल्यों को संजोते रहना,
वेदना-संवेदना संग.
स्वरुप को संभालना,
संबंध को निखारना,
विश्वास में ही विश्व के आस को सजीव रखना,

भाव भरे मन से नम – नरम रहना…
इससे शायद दुनियां में फिर-फिर
फैले मानवता की फसलें – नस्लें,
कम हो फॉसले,
दूर हो फिसलने,

हक,इंसानियत,ईमान को मिले बहुमान.
याद रहे,
तमाम तम के घिरते समीकरणों में भी,
एक सूरज अब भी उगता है,
अपनी धरती के लिए,
प्रेम को परोस कर,
खुद को समूचा उलीचते हुए.

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