लड़की का लौटना

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  • उमेश राय

शादी के बाद,
जब भी लड़की लौटती है,
अपने माता-पिता वाले घर….
वह चहकती-फुदकती है,
जैसे – चिड़िया दिनभर व्यस्त रहने
के बाद विन्यस्त होने अपने घरौंदा पर आती है.

भीड़ भरे उमस वाले पथ पर,
जैसे शीतलता का नीर-नीड़ मिल गया हो.
लड़की देखती है,
पनियाली आँखों से,
अपना घर-आँगन…

कुरेदती है ,
अपने पैर तले की माटी,
कुछ खालिस-खाटी तलाशती हो जैसे.
संपूर्णता में, लड़की यहाँ जीती है,
उसकी भूख की रूख गहरी हो जाती है यहाँ..

वह सिकुड़ती नहीं,
जुड़ती है यहाँ.
बंदिशे नहीं,खुली दिशाएं मिलती है,
उसे उड़ने को,उमड़ने को.

कितनी मधुर होती है,
याद की स्वाद!
वह अपनी बोयी यादों को,
नम करती है,
नमन करती है.

मैं देख सकता हूँ,
उसके चेहरे का हरापन!
अपने भीतर कुछ अंकुरित होते हुए.
देखता हूँ,
उसकी इस हंसी-खुशी से ही,
मुस्कुराती धरती अपनी धुरी पर चल रही है,
जीवन-विविधता पल रही है.

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