दशहरा मेला लाइवः रावण के पुतले की लकड़ी

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मैं अपने बेटे के साथ दशहरा मेला देखने गया। बाइक कहां खड़ी करेंगे, इस सवाल का जवाब नहीं मिला तो दो किमी. पैदल ही चलने का फैसला किया। वैसे भी हम सड़क पर गाड़ियों की भीड़ नहीं बढ़ाना चाहते थे। वैसे भी भीड़ में बाइक चलाने में मुझे दिक्कत होती है। चौक बाजार से होते हुए केशवपुरी बस्ती की मुख्य सड़क और वहां से गलियों से होते हुए नहर पार करके मेला स्थल पर पहुंच गए। तब तक काफी अंधेरा हो चुका था, इसलिए गलियों में भी अंधेरा ही था।

मेला स्थल पर मंच सजा था और दो बड़े पुतले खड़े थे। एक तो हम तुरंत पहचान गए, यह रावण है। अगर रावण के दस सिर नहीं होते तो उसे भी नहीं पहचान पाते। दूसरा पुतला शायद उसके पुत्र मेघनाद का था या फिर उसके भाई कुंभकर्ण का। पास ही लंका का प्रतीक स्ट्रक्चर बना था। रस्सियों के सहारे खड़े पुतले तमाशा बने थे, जो यह बताने के लिए काफी थे कि बुरा करोगे तो एक दिन पूरी दुनिया के सामने तमाशा बन जाओगे। मैंने पुतलों को बैंकग्राउंड में लेकर सेल्फी लेने वालों को भी देखा। पुलिस मेला सुरक्षा व्यवस्था में तैनात थी। फायर ब्रिगेड मौके पर खड़ा था।

खिलौनों, गुब्बारों, कपड़ों, चाट, समोसा, चाउमीन, जलेबी के स्टाल लगे थे। कुछ लोग अपने पत्तल दोने जहां मन किया, हाथ से नीचे छोड़कर आगे बढ़ रहे थे। नदी के किनारे का हिस्सा था, इसलिए धूल उड़ना लाजिमी था। उधर, मेला मंच पर रखी कुर्सियों पर कुछ लोग बैठे थे। मंच संचालक अतिथियों और मेले में सहयोग करने वालों का नाम पुकार रहे थे। मंच पर रखीं कुर्सियों पर अतिथि बैठे थे और बहुत सारे लोग अतिथियों के पीछे खड़े होकर अपनी मौजूदगी को दर्शा रहे थे। मंच के सामने जहां श्रीराम और रावण के युद्ध का मंचन किया जाना था, को रस्सियों से घेरा हुआ था। व्यवस्थाएं बनाने में लगे कार्यकर्ता दर्शकों को रस्सी से आगे नहीं आने की हिदायत दे रहे थे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दर्शकों की भीड़ तो श्रीराम और रावण के युद्ध का मंचन देखने के लिए वहां मौजूद थी। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, युवा सभी भीड़ का हिस्सा थे। कुछ लोग अपने छोटे बच्चों को कंधों पर बैठाकर मेला दिखा रहे थे। वहां मौजूद अधिकतर लोग रस्सी से आगे नहीं आने की हिदायत का पालन कर रहे थे, हालांकि ऐसा करने में उनको काफी परेशानी हो रही थी। इनमें से मैं भी एक था। बेटा तो व्यवस्था बनाने में जुटे कुछ कार्यकर्ताओं को जानता था, इसलिए उनके साथ मंच के पास खड़ा हो गया। मंच से लाटरी कूपन निकालकर विजेताओं के नाम की घोषणा की गई। बाल्टी से लेकर फ्रिज तक इनाम घोषित किए गए। सभी खुशी खुशी अपने इनाम लेकर लौटे। इसके बाद अतिथियों का सम्मान, उनका भाषण, थोड़ा सा प्रचार, महिमामंडन भी हुआ। आचार संहिता बताकर किसी नई घोषणा से बचा गया। मंच पर रामायण के पात्रों की भूमिका निभाने वालों को सम्मानित किया गया।

श्रीराम और रावण की सेनाओं के मध्य युद्ध का मंचन किया गया। दर्शक युद्ध का मंचन देखने के लिए ही तो वहां इकट्ठा थे। हर कोई आगे बढ़कर मंचन का साक्षी बनना चाहता था। मुझे आगे बढ़ती भीड़ ने काफी पीछे धकेल दिया था। इस मंचन को मोबाइल फोन के कैमरों में रिकार्ड करने वालों की कमी नहीं थी। मैं इतना पीछे हो गया था कि श्री राम और रावण के युद्ध का मंचन नहीं देख पाया। मैंने कुछ झलकियां लोगों की मोबाइल स्क्रीन पर देखीं। हर कोई उत्साहित होकर मेले का लुत्फ उठा रहा था।

मंच से लंका दहन की घोषणा होती है। कुछ ही देर में लंका आग के हवाले हो जाती है। इसके बाद वहां दस सिर वाले रावण सहित दोनों पुतले पटाखों की तेज आवाज के साथ दहकते हैं। पुतलों पर पटाखे अपना काम कर रहे थे और आग अपना। मिनटों में ही दोनों विशाल पुतले राख में तब्दील हो गए। मैंने अपनी आंखों से देख लिया कि अहंकार को ध्वस्त होते मिनट नहीं लगते। अगर श्रीराम जैसा संकल्प हो तो बुराई को खत्म करने में वक्त नहीं लगता, भले ही वो कितनी ही बड़ी क्यों न हो। उसकी जड़ें पाताल तक क्यों न फैली हों।

बहुत सारे लोग रावण के पुतले की राख की ओर दौड़ने लगे। मैंने कुछ लोगों को पुतले में लगी बांस की खप्चियां लाते हुए देखा। मेरे बेटे ने पूछा कि ये जलती हुई लकड़ी क्यों ले जा रहे हैं। मेरा जवाब था कि लोगों का यह मानना है कि रावण के पुतले में लगा बांस घर ले जाने से किसी को डर नहीं लगता। उसने पूछा, डर नहीं लगता, किससे डर नहीं लगेगा। मैंने कहा, ऐसा माना जाता है कि भूत, प्रेत से। मेरी इस बात पर वह हंस दिया। उसने फिर पूछा, रावण तो बुरा था, उसके पुतले की लकड़ी किसी का क्या भला करेगी। उसके पुतले की लकड़ी तो और डरा देगी। अगर घर में रखना ही है तो भगवान राम के धनुष बाण और हनुमान जी की गदा रखो।

बेटे की बात सुनकर मैंने खुद की बुद्धि पर अफसोस करते हुए कहा, मैं उसे यह क्या बता रहा था। मैं तो बेटे में अंधविश्वास को बढ़ा रहा था। वास्तव में मुझे चाहिए था कि मैं बेटे को भगवान श्रीराम और हनुमान जी के संस्कारों और आदर्शों को घर लाने के लिए कहता, जिनसे उसको अच्छाइयों पर चलने का संदेश मिलेगा। मैं उसको नियमों और कानून का सम्मान करना सिखाऊं। उसको मर्यादाओं में रहना सिखाऊं। उसको बड़ों का आदर करना और छोटे को स्नेह करना सिखाऊं। उसको देश का अच्छा नागरिक और इंसान बनना सिखाऊं। हम दोनों इसी तरह की कुछ बातें करते हुए दशहरा मेला से अपने घर लौट आए।

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