चमगादड़ अंधेरे में ऐसे तलाशता है अपना शिकार

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चमगादड़ अंधेरे में रहना पसंद करते हैं और अपने शिकार का पता भी लगा लेते हैं। पूरी तरह रात्रिचर चमगादड़ पेड़ों की शाखाओ ं, खंडहरों, निर्जन स्थानों व गुफाओं में उल्टे लटके रहते हैं। अंधेरे में इधर-उधर उड़ने के बाद भी चमगादड़ एक दूसरे से या किसी वस्तु व अवरोध से नहीं टकराते। ये देखने के लिए दृष्टि पर ज्यादा आश्रित नहीं रहते। चमगादड़ इको एपरेटस का इस्तेमाल करता है, जो एक तरह से राडार सिस्टम की तरह है। यह सिस्टम चमगादड़ के कान का प्रमुख हिस्सा होता है।

चमगादड़ उड़ने से पहले और उड़ने के दौरान अपने मुंह या नासाद्वार से एक प्रकार की चीख निकालता है, जो हवा में ध्वनि तंरगें (साउंड वेव्स) पैदा करती हैं। ये वेव किसी अवरोध से टकराकर चमगादड़ तक वापस पहुंचती हैं। इनके माध्यम से चमगादड़ किसी अवरोध की दूरी तथा उसकी स्थिति की ठीक जानकारी हासिल कर लेता है।  कीट खाने वाले चमगादड़ अधिक सेंसिटिव होते हैं।

चमगादड़ इकोलोकेशन पर निर्भर करते हैं। इकोलोकेशन उन वस्तुओं का पता लगाने के लिए ध्वनि तरंगों का उपयोग करने की प्रक्रिया है, जो उनकी नज़रों में नहीं है या दूरी पर हैं। डॉल्फ़िन, टूथेड व्हेल भी इस विधि का उपयोग करके वस्तुओं के स्थान को निर्धारित करते हैं। स्तनधारियों ने अंधेरे में जीने के लिए प्रतिक्रिया के रूप में इकोलोकेशन विकसित किया है। इससे उन्हें एक ध्वनि का उपयोग करके वातावरण का पता लगाने की क्षमता मिल जाती है, जो उन्हें खाना ढूंढने, परिवेश को नेविगेट करने और खतरे से सतर्क रहने में मदद करती है। यह उच्च आवृत्ति प्रणाली सोनार के समान काम करती है।

इकोलोकेशन का उपयोग करने की क्षमता वाले जीवों के अंग आमतौर पर एक ट्रांसमीटर और दो रिसीवर की तरह काम करते हैं। इससे इन जीवों को न केवल ऑब्जेक्ट की दूरी, बल्कि दिशा का भी अच्छी तरह से ज्ञान हो जाता है। कुछ चमगादड़ ध्वनि का इस्तेमाल शिकार का पता लगाने के लिए भी करते हैं। जो vocal chords से उच्च आवृत्ति वाली ध्वनियों को संशोधित करके उत्सर्जन करते हैं। 

प्रतिध्वनि के माध्यम से जीव वातावरण की स्थिति को समझते हैं। यह ध्वनि तरंगे इतनी तेज होनी चाहिए कि उस जीव तक वापस लौट सकें, जिसने इनको पैदा किया है। प्रतिध्वनि जमीन से बेहतर पानी में काम करता है, क्योंकि यह हवाओं के जरिये पानी में आसानी से ट्रेवल करता है। 

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