पत्रकारिता को जानना है तो छोटे शहरों से शुरुआत करो

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मैं ऋषिकेश ऑफिस में बतौर ट्रेनी फिर से काम करने लगा। मेरे इंचार्ज ने मुझे पहले भी काफी सपोर्ट किया था और इस बार भी तैयार थे। हमारे बीच बीट का बंटवारा नहीं हुआ था। वैसे भी, उस समय खबरों के केंद्र में डिग्री कालेज, शिक्षा विभाग, नगर पालिका, पुलिस, अस्पताल, रोडवेज, रोटेशन बस स्टैंड, आरटीओ, लोक निर्माण विभाग, जल निगम, जल संस्थान, बिजली विभाग, वन विभाग, रेलवे स्टेशन, टिहरी जल विकास निगम, पर्यटन, धार्मिक, व्यापारिक गतिविधियां, कृषि विभाग, पशुपालन विभाग, उद्यान विभाग, पशुलोक, बैराज, वन विकास निगम, पावर ग्रिड कारपोरेशन आदि होते थे।
हम ऋषिकेश शहर से हरिद्वार की ओर रायवाला तक, टिहरी की ओर कौड़ियाला और पौड़ी जिला में लक्ष्मणझूला सहित यमकेश्वर ब्लॉक की गतिविधियों को कवर करते थे। मुनिकी रेती और रायवाला की कवरेज के लिए संवाददाता तैनात थे।
उस समय अधिकतर पत्रकारों के पास स्कूटर, मोटरसाइकिल थे। मेरे पास कुछ नहीं था। रोजाना बस से ऋषिकेश पहुंचता। नटराज चौक से पैदल या फिर ऑटो में तीन रुपये किराये से दफ्तर आता था। कभी पैदल तो कभी कुछ पत्रकार साथियों के साथ उनके दोपहिया पर दफ्तरों और रिपोर्टिंग के लिए जाता। उस समय, आज की तरह सोशल मीडिया नहीं था। फोन ही कुछ पत्रकारों के पास थे। आफिस में फोन था, जिसमें लोकल के लिए कोई मनाही नहीं थी, पर एसटीडी के लिए परमिशन चाहिए थी। विज्ञप्तियां खूब आती थीं। एक कंप्यूटर आपरेटर आते थे, जो मुनि की रेती और रायवाला से आने वाली खबरों को टाइप करते थे। उस समय हम आपरेटिंग सिस्टम एमएसडॉस पर काम करते थे, जिसमें ब्लैक स्क्रीन पर लेटर ब्लिंक करते थे। कमांड पता थीं, जिनसे एक फाइल बनाकर उसमें बहुत सारी खबरों को टाइप करते थे।
मैं बात कर रहा था, रिपोर्टिंग की। हम रिपोर्टरों पर रूटीन के साथ दूसरों से कुछ अलग खबर को कवरेज करने का दबाव था। दूसरे दिन जब प्रतिद्वंद्वी अखबार से कोई रूटीन की ही खबर छूट जाती तो हमारे चेहरे खिल जाते थे। जब हमसे कोई खबर छूटती तो वो बड़े खुश होते थे। प्रतिस्पर्धा केवल खबरों को लेकर थी, वैसे हम सब साथ घूमते थे। किसने क्या खास खबर बटोर रखी है, साथ घूमने वाले को भी पता नहीं चलता था। लिखने का सबका अलग-अलग अंदाज था। एकजुटता भी खूब थी। एक दूसरे का सम्मान भी खूब करते थे।
हमारे बीच कुछ ऐसे पत्रकार भी थे, जो वरिष्ठ कहलाना तो पसंद करते थे, पर रूटीन की खबरों से उनका कोई वास्ता नहीं था। वो अक्सर एक्सक्लूसिव खबरों पर चर्चा करते थे, पर उनके अखबारों में हमें एक्सक्लूसिव कुछ मिलता नहीं था। वो हमारी तरह सरकारी अस्पताल, कोतवाली और तहसील या किसी विभाग के दफ्तर में रूटीन में संपर्क नहीं करते थे। वो उस समय अवतरित होते थे, जब कभी चीफ सेक्रेट्री, कमिश्नर, डीआईजी, जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक शहर में आते थे।
हम तो सबसे मिलते थे, सिपाही से लेकर डीजीपी तक से।हम केवल खबरों के लिए मिलते थे, क्योंकि हमें खबरें टाइम पर भेजनी होती थीं और खबरें भेजने के लिए हर माह हमारे खाते में तनख्वाह आती थी। हम तो उन अधिकारी, मंत्री, मुख्यमंत्री से मिलते थे, जो हमारे शहर आते थे, बस पता चलना चाहिए, उनका काफिला आगे-आगे और हमारे दुपहिया पीछे- पीछे।
ऋषिकेश एक ऐसा शहर है, जहां पत्रकारिता करने वाला व्यक्ति कहीं भी मात नहीं खा सकता। वो कैसे, मैं बताता हूं। ऋषिकेश चार जिलों से कनेक्ट है। पहला यह देहरादून जिला का हिस्सा है। देहरादून जिला के ऋषिकेश शहर सहित तहसील के कई गांवों, जिनमें कृषि से लेकर पशुपालन तक और सीजन में गंगा में बाढ़ तक की कवरेज इन्हीं के भरोसे हैं। अब तो एम्स, ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेलवे, आल वेदर रोड जैसे बड़े प्रोजेक्ट ऋषिकेश की ही टीम कवर करती है। महाकुंभ सहित कांवड़ यात्रा और अन्य धार्मिक महत्व के बड़े कार्यक्रम ऋषिकेश में होते हैं।
दूसरा, इस शहर की सीमा हरिद्वार जिला से लगती है। वैसे भी धार्मिक महत्व के अनुसार, हरिद्वार और ऋषिकेश एक दूसरे से संबंधित हैं। तीसरा, ऋषिकेश की सीमा टिहरी जिला से लगती है, जिसमें मुनिकी रेती, रामझूला, तपोवन से लेकर कौड़ियाला तक की कवरेज ऋषिकेश वालों के ही जिम्मे आती है। राफ्टिंग से लेकर पर्यटन और धार्मिक यात्रा सब ऋषिकेश की टीम ही कवर करती है।
चौथा, पौड़ी जिला स्थित लक्ष्मणझूला सहित यमकेश्वर ब्लाक का बड़ा हिस्सा, चीला बैराज से लेकर राजाजी पार्क क्षेत्र का बड़ा हिस्सा, ऋषिकेश से कवरेज होते हैं। ऋषिकेश गढ़वाल का बड़ा व्यापारिक केंद्र है। साथ ही, राजनीतिक रूप से भी यह समृद्ध विरासत वाला क्षेत्र है। अलग से, यहां होने वाला वीआईपी मूवमेंट पत्रकारों के बहुत महत्वपूर्ण होता है। देश विदेश से पर्यटकों का आना तो वर्षभर लगा रहता है। योग की अंतराष्ट्रीय राजधानी ऋषिकेश वास्तव में किसी बड़े शहर जितनी पत्रकारिता से ज्यादा अनुभव कराता है।
पत्रकारिता को जानना है तो आप किसी ऐसे शहर से शुरुआत करने का अवसर मत खोना, जहां चुनौतियां ज्यादा हो। इसकी वजह है कि शुरुआत में आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, पर जानने के लिए बहुत सारी संभावनाएं होती हैं। जहां चुनौतियां होती हैं, वहीं समाधान और संभावनाएं भीं। आपके पास बहुत सारी बीट होती हैं, आप नगर पालिका से लेकर तहसील तक की प्रशासनिक इकाइयों, ग्राम पंचायतों सहित कई बीट पर काम कर रहे होते हैं।
आपको अगर छोटी इकाइयों की जानकारी नहीं होगी तो बड़े शहर में या राज्य स्तर की पत्रकारिता में आपको दिक्कतें उठानी पड़ेंगी। आपको विकास की प्रक्रिया और वहां काम करने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को जानने का मौका मिलता है। मेरा मानना है कि आपको किसी भी तंत्र की पहली सीढ़ी या उसकी बुनियाद की जानकारी होगी, तभी आप बडृ़े फलक पर उनको देखने में सक्षम हो सकेंगे।
हमें ग्राम पंचायत सदस्य से लेकर मुख्यमंत्री तक से मिलने का अवसर मिला। हमने केंद्रीय मंत्रियों को भी कवरेज किया। हम अनुभव ले रहे थे कि किस तरह की परिस्थितियों या खबरों में क्या स्टैंड लेना है। समय कट रहा था और हम अनुभवी हो रहे थे। हम छुट्टी वाले दिन भी चैन से नहीं बैठते थे। मुझे याद है कि कई किमी. पैदल चलकर जाखन नदी के किनारे चलते चलते सन गांव पहुंच गए थे। श्यामपुर क्षेत्र के गांवों में घूमे, किसानों से बात की, ग्रामीणों से मिले और उनकी बात अखबार में लिखी। हम कुछ नया करना चाहते थे और इसी नयेपन के सहारे जर्नलिज्म में आगे बढ़ना चाहते थे।
लगभग एक साल हुआ होगा या इससे कुछ ज्यादा। हमारे दफ्तर में एक चिट्ठी पहुंची, जिसमें साफ साफ लिखा था कि किसी भी पत्रकार को अब सीधे मालिक से बात नहीं करनी है। कुछ नये बड़े अधिकारियों के नाम लिखे थे और उनके नंबर अंकित थे। उस दिन से हमें समझ में आ गया था कि हम कॉरपोरेट का हिस्सा बन चुके हैं। हमें क्या फर्क पड़ना था, हमें तो खबरें लिखनी थी, जो हमारा काम था। कॉरपोरेट हो चुके हमारे अखबार का दफ्तर तो उसी हालत में रहा, जैसा पहले था। बस, आदेश निर्देश पहले से ज्यादा हो गए।
खबरों के साथ एक औऱ काम था हमारा, ऋषिकेश में अतिथि देवोभवः का। उनकी व्यवस्था इंचार्ज करते थे। बाहर से आने वाले अखबार के अधिकारियों को चारधाम यात्रा या पर्यटन के लिए जाते समय ऋषिकेश में रुकना होता था। सभी की कोशिश रहती है कि सरकारी व्यवस्था हो जाए। कुछ ही लोग होंगे, जो अपने खर्च के लिए जेब में हाथ डालते होंगे। अधिकतर तो सरकारी गेस्ट हाउस या होटल में विश्राम करने, किसी बढ़िया रेस्रां में खाने की इच्छा पाले होते हैं। सबकी नजर में यही होता है कि रिपोर्टर सभी व्यवस्थाएं करा लेगा। उसकी बहुत चलती है। वो तो भला हो ऋषिकेश औऱ हरिद्वार जैसे स्टेशनों का, जहां आश्रमों में रहने और भोजन की अच्छी व्यवस्थाएं हैं। रिपोर्टर और खासकर इंचार्ज की इन स्टेशनों पर बहुत बुरी हालत होती है। इंचार्ज का क्या है, वो अपने रिपोर्टर साथी से कहकर व्यवस्थाएं कराने के लिए कहते हैं।
एक रिपोर्टर ने तो किसी बड़े अधिकारी के गेस्ट हाउस में रुकने का बिल अपनी जेब से जमा कराया और जब बिल कंपनी में भेजा तो मालूम हुआ कि वो बड़े अधिकारी घूमने के लिए एडवांस लेकर गए हैं, इसलिए बिल रद हो गया। एक बार सरकारी गेस्ट हाउस में ठहराए गए बड़े अधिकारी के खाने का बिल रिपोर्टर ने दिया। बड़े अधिकारियों के सम्मान में बुकें का खर्चा अलग से झेलो। कुछ लोग तो अपनी गाड़ी के आगे आगे पुलिस की गाड़ी को दौड़वाने की डिमांड तक कर देते हैं। इनको भी रास्ता साफ चाहिए। इन अधिकारीनुमा पत्रकारों को यह सब अच्छा लगता है।
खैर, छोड़िए ये बातें, हमें इनमें बिल्कुल भी नहीं पड़ना, पर किसी छोटे और महत्वपूर्ण स्टेशन पर एक रिपोर्टर को तनख्वाह ही क्या मिलती है, जो अपनी जेब से दूसरों के घूमने, खाने के बिल जमा करता रहे।
अब आपको एक महत्वपूर्ण बात बताता हूं कि धर्मशाला में मेरी तनख्वाह 3500 रुपये प्रति माह थी। ऋषिकेश में पुनर्नियुक्ति मे ंयह घटकर 3000 रुपये हो गई। पर मेरे लिए राहत की बात यह थी कि मैं अपने घर में था। लगभग एक साल बीत गया और मुझे प्रमोशन मिल गया। मुझे आफिस से फोन आया कि अब तुम स्टाफ रिपोर्टर हो गए हो। मैॆं स्टाफ रिपोर्टर का मतलब जानता था सब एडिटर यानी उप संपादक, पर मेरा भ्रम उस समय दूर हो गया,. जब मुझे पता चला कि मेरा पद नाम, जो शायद मैंने कभी नहीं सुना था और हो सकता है कि पत्रकारिता करने वाले अधिकतर लोग भी नहीं जानते होंगे। मेरा पद नाम था- न्यूज असिस्टेंट। यह क्या होता, क्या यह स्टाफर है या ट्रेनी का दूसरा नाम।
मेरी खबरों पर कार्यालय संवाददाता लिखा जाने लगा। एक दिन मेरठ से एक पीए ने मुझे फोन करके कहा, अपनी हद में रहा करो। बहुत बुरा लगा, क्योंकि फोन करने वाला शख्स खुद अपनी हद में नहीं था। यह वो शख्स है, जो मेरठ से देहरादून आकर पत्रकारों पर रौब जमाता था।अखबारों के दफ्तरों में जूनियर्स या कहें ट्रेनियों को वहां के एकाउंटेंट, पीए, मुंह लगे कुछ कर्मचारी, मैनेजमेंट से जुड़े कुछ लोग, जिनको खुद ही अपनी हद में रहना नहीं आता, संपादकीय में जूनियर्स पर सवार होने को तैयार रहते हैं। सभी ऐसे नहीं हैं,मैनेजमेंट के कुछ लोग संपादकीय टीम का सम्मान भी करते हैं। ये लोग हमेशा सामंजस्य बनाकर रखते हैं। मुझे मालूम था कि मुझे हेड आफिस पर तैनात उस शख्स ने ऐसा क्यों कहा। पर, एक दो दिन महसूस किया और फिर से जुट गया अपने काम में।
धीरे धीरे ही सही अखबार की राजनीति अपना काम करने लगी। मेरे और इंचार्ज के बीच सौहार्द्र और एक दूसरे को सहयोग व सम्मान को किसी की नजर लग गई। इसकी वजह जो अब समझ में आती है, वो है, हमारे बीच मजबूत संबंध देहरादून में किसी को पसंद नहीं आ रहे थे। एक दिन वो भी आया, जब मुझे रुड़की जाने को कह दिया गया। मैंने साफ मना कर दिया, क्योंकि मैं सतर्क हो चुका था। इनको मेरे पैसे तो बढ़ाने नहीं थे। मैं 2003 में देहरादून डेस्क पर तैनात हो गया।
डेस्क पर रहने के दौरान बहुत सारे खेल देखे। वहां तो बहुत सारे ट्रेनी टाइप, बड़े अधिकारी( पत्रकार नहीं कहूंगा) के खास बने थे। वहां मैंने देखा कि किसी अखबार में भी सत्ता के बदलने जैसा नजारा होता है। मैंने वरिष्ठों को बड़े अधिकारी के चैंबर में खड़े हुए देखा और ट्रेनी को कुर्सी पर बैठकर चाय पीते हुए पाया। उसको भी वरिष्ठ का सम्मान क्यों करना था, वो तो बड़े अधिकारी का खास था। ये ट्रेनी टाइप पूरे दफ्तर की मुखबिरी करते थे। कंप्यूटर पर खबरों को संपादित करने वाले उपसंपादकों और रिपोर्टरों की स्क्रीन पर झांकना इनकी आदत थी। ये सुबह से लेकर रात तक वहीं मंडराते और यह जताने की खूब कोशिश होती कि, अखबार ये ही चला रहे हैं, बाकी लोग तो यूं ही ड्यूटी पूरी करने आते हैं।
इन कुछ ट्रेनियों, जिनको साल- दो साल में ही उपसंपादक का तमगा मिल गया, वहीं हम जैसे लोग अभी भी ट्रेनी ही थे, क्योंकि हमारा वहां कोई नहीं था। हमें जिनके ग्रुप का हिस्सा माना जाता था, वो भी अखबार को छोड़ चुके थे। इन खास लोगों ने भी अपने आर्बिट बना लिए थे, जिसमें कुछ वरिष्ठ भी परिक्रमा करते दिखे। बड़ी गजब की होती है, अखबार में राजनीति। कुछ वरिष्ठ ने बड़े अधिकारी की जी हुजूरी में अपने पुराने साथियों को भुला दिया।
आपको यह बता दूं कि आपको किसी बड़े अधिकारी के आर्बिट में चक्कर काटने का सुख पाना है तो तीन ऑप्शन महत्वपूर्ण हैं- पहला, आप जमकर मेहनत करें और कुछ जगहों पर उनके विकल्प बन जाएं। अखबारों में खबरों संबंधी इश्यु को सॉल्व करने में सबसे आगे रहें। खास मौकों पर अखबारों के स्पेशल पेजों को प्लान करें, ले आउट तय कराने से लेकर एडिटिंग तक में जमकर काम करें। बाहर से मांगे जाने वाले इनपुट को समय रहते भेज दें। अपने हर काम को भी चैंबर में ले जाकर दिखाएं और पब्लिसिटी करें।
इसी बीच मौका मिलते ही दूसरों की कुछ अच्छाइयों और ज्यादा बुराइयों पर चर्चा कर लें। आप खबरों को पढ़ें या न पढ़ें, पर आप पेज बनाना अच्छी तरह जानते हैं। खुद को सबसे ज्यादा मेहनती दिखाने की कोशिश करें। जूनियर्स से कन्टेंट लेकर अपनी खबर बना दें। इन सभी कार्यों को करने के लिए आपको थोड़ा सा सीनियर रहना होगा।
दूसरा ऑप्शन के लिए जरूरी नहीं है कि खबरें लिखनी आती हों। सीनियर होना भी जरूरी नहीं है। ट्रेनी भी यह काम करते हैं और प्रमोशन भी पा जाते हैं। ये दफ्तर से लेकर बाहर के स्टेशनों की मुखबिरी करते हैं। बड़े अधिकारी को यह बताते रहें कि किसकी किसके साथ नहीं बन रही है। किस डेस्क पर क्या हो रहा है। कहां डेस्क और रिपोर्टिंग के बीच तनातनी चल रही है। कौन खबरों की ऐसी तैसी कर रहा है। कौन किसकी खबरों मं रूचि ले रहा है। किसकी खबर में हेडिंग गलत लगी है। कौन खबरों को सही ढंग से नहीं पढ़ रहा है। कौन संपादन में कमजोर है और कौन लगातार क्या गलतियां कर रहा है। किस रिपोर्टर ने खबर छोड़ दी। दफ्तर में कल क्या हुआ था।
कौन सा रिपोर्टर फोन पर ही खबरें इकट्ठी करता है। कौन सा रिपोर्टर फील्ड में जाता है या नहीं जाता है। कौन चाय पीने के समय बुराई कर रहा था। कौन किसके साथ चाय पीने गया था। बाहर लॉन में कौन लोग ज्यादा देर तक बातें करते हैं। ये लोग यह सलाह भी दे देते हैं कि किससे क्या काम लिया जा सकता है। जमकर चापलूसी करें। बड़े अधिकारी की चार लाइनों को भी ऐसा बताने की कोशिश करते हैं कि ये न तो भूतकाल में लिखी गईं थीं और न ही भविष्य में लिखी जा सकती हैं। इनकी प्रशंसा करते रहते हैं, भले ही इनके मन कुछ और होता है।
तीसरा ऑप्शन है कि आप पहले और दूसरे वाले ऑप्शन्स के खास प्वाइंट को लेकर काम करें। मैंने तो ज्यादातर लोग दूसरे ऑप्शन वाले देखे हैं। जूनियर्स के लिए दूसरा ऑप्शन्स फिट है। इससे वो बड़े अधिकारी के आर्बिट में चक्कर लगाने का पात्र माना जाता है। उसको कुछ सीनियर्स से भिड़ने की छूट मिल जाती है। उसको अभद्रता की छूट मिल जाती है।
मैं फिर भी यह बात कहूंगा कि अखबारों में अधिकतर लोग इन तीनों ही ऑप्शन में नहीं होते। वो अपने अनुभवों और मेहनत से आगे बढ़ने की कोशिश में होते हैं। वो लगातार वो काम करते हैं, जो उनको दिया जाता है।
आपको बता दूं कि वर्ष 2005 में मुझे न्यूज असिस्टेंट से प्रमोशन दे दिया गया, वो भी लगभग 200 रुपये के इन्क्रीमेंट के साथ। मेरे हाथ में लगभग छह या सात हजार रुपये आ रहे थे। यानी नौ साल में मुझे जूनियर सब एडिटर का पद मिला। मैं अभी भी सब एडिटर नहीं बन पाया था। कुल मिलाकर यह समझ लीजिए कि मुझे न्यूज असिस्टेंट बनाकर भी ट्रेनी ही रखा गया था। जूनियर सब एडिटर क्या होता है, मेरी समझ में नहीं आता। यह भी ट्रेनी शब्द का थोड़ा सा सम्मान वाला शब्द है। इतने साल में तो इन बड़े अधिकारियों के ट्रेनी भी बड़े अधिकारी बन गए हैं। यह सब इसलिए क्योंकि हमारी बात रखने वाला कोई नहीं था, जबकि काम लेने वालों की संख्या बहुत ज्यादा थी।
कल आपसे रिपोर्टिंग के स्रोतों पर बात करेंगे। आपको यह भी बताएंगे कि अखबार में कौन लोग, किसी की मेहनत पर पानी बहाते हैं और क्यों। आपके साथ रिपोर्टिंग की शक्ति पर भी बात करेंगे। तब तक के लिे बहुत सारा धन्यवाद, क्योंकि आप मुझे पढ़ रहे हैं।
 

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