पत्रकारिता तो अनुभवों से आती है…

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एक युवा बहुत सारे सपने लेकर पत्रकारिता में आता है। उससे पूछो, तुम पत्रकारिता में क्यों आए, जवाब मिलेगा। मैं बदलाव करना चाहता हूं। मैं मुद्दों को आवाज़ देना चाहता हूं। मैं आम व्यक्ति की अभिव्यक्ति को ज्यादा से ज्यादा लोगों और सिस्टम तक पहुंचाना चाहता हूं। मैं जनता की मदद करूंगा और सिस्टम को पटरी पर लाने का प्रयास करूंगा। यह सब कुछ उनसे सुनने को मिलेगा। हो सकता है, वो और भी कुछ बताएं…।
वैसे असल बात यह है कि वो पत्रकारिता की चमक से प्रभावित होकर इस पेशे में आते हैं। यह चमक, पत्रकारिता का बाहरी आवरण है…क्योंकि वो पत्रकारिता की रीढ़ बनकर काम कर रहे असली पत्रकारों से कभी नहीं मिले होते। उनको दिखता है… कि पत्रकार बड़े अधिकारियों और नेताओं के बहुत करीब होते हैं। पत्रकार किसी के भी खास होते हैं। पत्रकार यह कर सकता है, पत्रकार वह कर सकता है। पत्रकार सब कुछ कर सकता है। पत्रकार वीआईपी होता है।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि पत्रकारिता में प्रवेश करना खराब बात है। जहां पत्रकारिता के बहुत सारे आयाम हैं, वहीं इसमें तरक्की की बहुत सारी संभावनाएं भी हैं। पत्रकारिता का मतलब खबरों के संकलन और उनके संपादन तक ही सीमित नहीं रह गया। पत्रकारिता प्रिंट और डिजीटल मीडिया में नौकरी करने तक ही सीमित नहीं है। यह स्वतंत्र होकर भी की जा सकती है।
मैं यहां प्रिंट पत्रकारिता की बात कर रहा हूं। इसका सबसे पहला नियम है, आप कैसा लिखते हैं, इसका उतना महत्व नहीं है। आप क्या लिखते हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। हालांकि कैसा लिखते हैं का महत्व अपनी जगह है। हम कैसा और क्या, इन दोनों पर चर्चा करेंगे।
पहली बात तो यह कि पत्रकारिता सीखने से नहीं, बल्कि अनुभवों से होती है। किसी खास अवधि का प्रशिक्षण लेकर पत्रकारिता को नहीं समझा जा सकता। अगर, आपको कोई इस भ्रम में डालने की कोशिश करता है कि छह माह या एक साल में पत्रकारिता सीख जाएंगे या फिर डिग्री या डिप्लोमा से आप पत्रकारिता को जान जाएंगे ,तो मैं इसका विरोध करता हूं।
पत्रकारिता सीखने नहीं बल्कि तन्मयता से जीने का विषय है। यह अनुभवों से हर दिन कुछ न कुछ जानने का विषय है। आप बहुत अच्छा लिखते हैं, तो आप खबरों की पत्रकारिता में फिट हो जाएंगे, यह बात में दावे के साथ नहीं कह सकता। प्रिंट के लिए खबरों का लिखने का अपना ट्रेंड है,जिसमें शब्दों की संख्या तक सीमित कर दी जाती है। जिसमें भाषा का ज्ञान होने के साथ आपको उस विषय की जानकारी होना जरूरी है, जिसकी आप खबर लिख रहे हो।
खबरों में लच्छेदार भाषा नहीं चलती, वहां सपाट लिखना होगा, बिना कोई लाइन रीपिट किए हुए। खास प्वाइंट, अर्काइव में रखे डाटा का इस्तेमाल कर सकते हैं। खबरें हो या विश्लेषण में आपको बैलेंस रहना होगा।
साथ ही, यह भी आपको जानकारी होनी चाहिए कि किस खबर को कितना लिखा जाए। क्योंकि प्रिंट में स्पेस की बहुत दिक्कत होती है। वैसे यह बात सही है, अगर आपको कम शब्दों में ज्यादा तथ्य प्रस्तुत करने की आदत डालनी है तो प्रिंट में काम करना चाहिए। इससे आपके लेखन में जान आ जाएगी। प्रिंट आपको खबरों में जलेबियां तलने से रोकता है।
हां, फिर से अच्छा लिखने की बात पर। पहले हम यह समझते हैं कि अच्छा लिखना किसे कहते है। अच्छा लिखने का मतलब किसी के बारे में अच्छा लिखने से नहीं है। अच्छा लिखने का अर्थ है कि आपकी भाषा उन लोगों की समझ में आनी आवश्यक है, जिनके लिए आप लिख रहे हैं। आपका संवाद सामान्य हो, बोलचाल वाला हो, जिसको पढ़ने या सुनने वाले को दिमाग को दौड़ाने की जरूरत न पड़े। उनको किसी दूसरे से आपके लिखे को समझने की जरूरत न पड़े। मैं बहुत से युवाओं से मिला हूं, जो नये नये शब्दों का जाल बुनने को अच्छा लिखना कहते हैं। जब आपका लिखा किसी की समझ में ही नहीं आएगा तो फिर लिखने से क्या फायदा।
खबरों को कैसे लिखा जाए । इसके लिए सबसे पहले आपको भूलना होगा कि आप किसी बड़े संस्थान से मास कॉम या फिर कोई और डिग्री हासिल की है। अगर आप प्रिंट में काम करना चाहते हैं तो किसी अखबार के दफ्तर में जाकर वहां आने वाली प्रेस रिलीज को बिना किसी हड़बड़ाहट के पढ़ने की आदत डालें। आप विज्ञप्ति का एक-एक शब्द पढ़िए और उससे समझिए। प्रेस विज्ञप्ति का जिक्र इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि कई बार इनकी भाषा को समझना बहुत आसान नहीं होता। किसी अखबार के लिए जो बात चार या छह लाइन की होती है, विज्ञप्ति भेजने वाले उसको दो पेज में भेजते हैं।
ऐसा भी होता है कि किसी विज्ञप्ति में लिखी चार या छह लाइन किसी अखबार के लिए किसी पेज की लीड हो सकती है। अक्सर विज्ञप्तियों पर काम करके खबरों को विस्तार दिया जाता है।
वैसे, मैं आपको बता दूं कि डिजीटल युग में पहले की तरह प्रेस विज्ञप्ति बहुत कम आती होंगी। अधिक बार ऐसा होता है कि व्हाट्सएप या मेल पर मिलने वाली विज्ञप्तियों को रिपोर्टर सीधा कॉपी करके अपने सीएमएस (कन्टेंट मैनेजमेंट सिस्टम) पर पेस्ट कर देते हैं। पूरी विज्ञप्ति को वहीं एडिट करने के बाद डेस्क को सबमिट कर देते हैं।
आप रिपोर्टर से मूल प्रेस विज्ञप्तियों को अपने पास भेजने को कह सकते हैं। आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। आप ध्यान से उन विज्ञप्तियों को पढ़िए और समझिए कि उसका मूल तत्व क्या है। यह विज्ञप्ति किसी कर्मचारी संगठन, व्यापार मंडल, राजनीतिक दल या सरकार के सूचना विभाग की हो सकती है। आप सीधे कंप्यूटर पर टाइप करने की बजाय इनको किसी कागज पर लिखने की आदत डालिए।
कागज पर लिखकर उसको अपने सामने फिर से किसी सीनियर से संपादित कराएं या फिर उस पर उनकी सलाह प्राप्त करें। वैसे आपको बता दूं कि वर्तमान में डेली प्रिंट मीडिया में व्यस्तता के चलते बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे जो आपकी कॉपी पर समय देंगे और आपको समझाएंगे। हर कोई टाइम मैनेजमेंट के दबाव में काम कर रहा है।
कोई बात नहीं, आपकी एक या दो विज्ञप्ति तो किसी तरह से चेक हो ही जाएंगी, जिनमें आपको कुछ ऐसी सलाह मिल जाएंगी, जो हमेशा याद रहकर आपके काम आ सकती हैं।
दूसरे दिन आप उन रीलिज को सभी अखबारों में देखें। उनका संपादन कैसे हुआ है। अखबारों के लिए वो विज्ञप्तियां कितनी महत्वपूर्ण हैं। उनका प्लेसमेंट क्या है। कभी कभी प्लेसमेंट से भी खबरों का मूल्यांकन कर सकते हैं। यह क्रम लगातार जारी रहे। आप कुछ खबरों को पढ़कर उन्हें समझिए और फिर अपनी भाषा में लिखने का प्रयास करें।
खबरें लिखने की तकनीकी को समझें, उनके मूल तत्व को जानें, तथ्यों को बिना किसी लाग लपेट के प्रस्तुत करें। समाचार को अपने विचार से बिल्कुल अलग रखें। सत्य जानने के बाद भी समाचार को बिना किसी तथ्य के प्रस्तुत न करें, क्योंकि यहां सत्यमेव नहीं, तथ्यमेव जयते का सिद्धांत लागू होता है।
पत्रकारिता एक या दो दिन या एक साल या दो साल में सीखने का विषय नहीं है, यह तो जिंदगीभर कुछ न कुछ सीखने का मौका देती है।
अब आपको बताते हैं कि अखबारों में होता क्या है। यह एक अनुभव है, जिसका जिक्र कर रहा हूं। किसी नामी यूनिवर्सिटी से डिग्री लेकर आने वालों को अखबारों में बतौर ट्रेनी एंट्री मिल जाती है। मैं यह बात इसलिए बता रहा हूं कि अखबारों के दिल्ली, नोयडा स्थित दफ्तरों में कुछ माह की ट्रेनिंग के बाद यह समझने की भूल कर दी जाती है, वहां ट्रेनिंग लेने वालों को पत्रकारिता का ए से जेड तक ज्ञान हो गया।
ये युवा, राजधानियों में स्थित दफ्तरों में ट्रांसफर कर दिए जाते हैं। इनका पैकेज किसी सीनियर से ज्यादा हो सकता है। इनमें से अधिकतर कुछ भी जानने या समझने की जरूरत नहीं समझते। ऐसा वो करें भी क्यों, क्योंकि वो तो अखबारों के बड़े दफ्तरों में बड़े कहलाए जाने वाले पत्रकारों से ट्रेनिंग लेकर आते हैं। मुख्यालयों से निर्देश होते हैं, इनको सहयोग करें।
सभी सहयोग करते हैं, लेकिन इनकी इच्छा कुछ जानने की नहीं होती। कुछ दिन या महीने स्थानीय स्तर पर ये अखबार के दफ्तर में सिर्फ संख्या बल बढ़ाने में योगदान देते हैं। पत्रकारिता में वो ही लंबी पारी खेलेंगे, जो मेहनत और लगन से काम करेंगे। हालांकि यहां चापलूसी वाले भी ज्यादा दिनों तक और बड़े पदों तक पहुंच जाते हैं। ये कैसे पहुंचते हैं इसका भी जिक्र करेंगे। फिलहाल तो मेहनत से अनुभवों की बात हो रही है।
कुल मिलाकर कहना चाहूंगा कि पत्रकारिता के किसी भी पाठ्यक्रम में दाखिले से पहले युवाओं को मीडिया के दफ्तरों में एक या दो दिन जरूर बिताने चाहिए। लिखने का क्या है… वक्त के साथ सीख जाएंगे, पर पत्रकारिता यानि क्या लिखना है… को जानना बहुत जरूरी है।

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