जंगल का आर्केस्ट्रा !

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केदारघाटी की यात्रा के दौरान हम रुद्रप्रयाग जिला के गिंवाला गांव पहुंचे। केदारनाथ हाईवे से गांव की ओर जा रहा चौड़ा रास्ता अभी बन रहा है। जगह-जगह पत्थरों और रोड़ी के ढेर पड़े हैं। थोड़ा ऊंचाई पर पहुंचने पर मंदाकिनी नदी और दोनों तरफ खेतों का नजारा वाकई शानदार रहा। धान की फसल कट चुकी थी। पुआल और धान को अलग करने का काम चल रहा था।

हमारे लिए मौसम बहुत अच्छा था, क्योंकि हम बिना हांफे कभी ऊंचाई तो कभी ढलान पर आगे बढ़ रहे थे। हमने गिंवाला गांव में प्रवेश करने के दो रास्ते देखे। एक तो वो जिस पर कार आसानी से जा सकती है। दूसरा रास्ता खेतों के किनारे पक्की गूल पर से होते हुए हाईवे स्थित बाजार तक है। इस रास्ते से हम वापस लौटे थे। यह गांव से बाजार तक जाने का शार्टकट है।

गिंवाला गांव में प्रवेश से पहले ही हमें सुनाई दिया जंगल का आर्केस्ट्रा ! शायद, गांव से बाहर स्थित इस छोटे से जंगल के निवासियों के लिए संगीत ज्यादा अहम है, इसलिए तो वो हर समय- दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, संगीत साधना में लीन रहते हैं। हम भी कुछ देर के लिए ही सही उनकी लयबद्ध ध्वनियों में खो गए। यहां आने वाले हर शख्स का स्वागत इसी तरह होता है। यह सच है कि यहां मैंने किसी भी कीट पतंगें को न तो गाते हुए देखा और न ही किसी को अपनी पसंद के वाद्ययंत्र पर प्रस्तुति देते हुए, पर उनको सुना है, जिसका जिक्र कर रहा हूं।

हां, इस जंगल के पास कुछ समय बिताकर यह जरूर कह सकता हूं कि यह शानदार पेशकश उन सामूहिक प्रयासों का नतीजा है, जो भागदौड़ की जिंदगी से कहीं दूर शांति और सुकून के लिए अनवरत हैं।यह जंगल और उसमें रहने वालों का संगीत है, जो चाहे धीमा हो या फिर तेज, किसी को बेचैन नहीं करता। यह ध्वनि और शोर को स्पष्ट करता है।

थोड़ा आगे बढ़े तो कक्षा चार के छात्र कृष व मोहित, कक्षा तीन के आलोक व कक्षा दो की छात्रा मोनिका से मुलाकात हो गई। हमने बच्चों से वही सवाल पूछा,जो अक्सर सभी से पूछते हैं- पेड़ घूमने क्यों नहीं जाता। आपको बता दूं कि बड़ों से जब भी यह सवाल पूछा, वो या तो चौंक जाते हैं या फिर मुस्करा कर सवाल को टालने की कोशिश करते हैं। कोई कोई तो हम से ही पूछ लेता है कि क्या पेड़ भी चलते हैं। क्या तुमने पेड़ों को घूमते हुए देखा है। क्या बात करते हो।

बच्चे, फिर भी जवाब देने की कोशिश करते हैं। गिंवाला के कृष, आलोक, मोहित व मोनिका ने हमें बताया कि पेड़ आक्सीजन, फल, छाया देते हैं। इनकी जड़ें पहाड़ की मिट्टी को बांधकर रखती हैं। पेड़ों को काटना नहीं चाहिए, इनकी रक्षा करनी चाहिए।

हमने गिंवाला के निवासियों से खूब बातें कीं। गांव से बाहर करीब डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर घराट (वाटर मिल) देखने का मौका मिला। गिंवाला के सोहन सिंह इस घराट को चलाते हैं। गदेरे से चलने वाली घराट पर पूरा गांव गेहूं पिसाता है। सोहन सिंह कहते हैं कि घराट से आटा कभी जलता नहीं है। इस आटे की रोटियों में ज्यादा स्वाद होता है।बिजली वाली चक्की के आटे में वो बात नहीं है। अनाज पिसाई और थोड़ी बहुत खेती से उनका गुजारा चल जाता है।

करीब 51 साल के गोविंद सिंह ने 1988 में इंटरमीडिएट किया था और फिर बीएससी की डिग्री हासिल की। दिल्ली में कंप्यूटर आपरेटर की नौकरी करते थे। घर से दूर नौकरी में मन नहीं लगा और एक दिन अपने गांव लौट आए। कहने लगे, अब जो भी कुछ करूंगा, अपने गांव में रहकर ही करूंगा। पोल्ट्री फार्म चलाते हैं। मस्त्यपालन के लिए सीमेंटेंड तालाब बनाया है। पशुपालन करते हैं। डेयरी चलाते हैं। गोविंद कहते हैं कि अपने गुजारे लायक हो जाता है। अपने गांव में रोजगार की संभावनाएं हैं तो बाहर क्यों जाऊं। मेरा मन तो अपने गांव में ही लगता है। यहां सबकुछ अच्छा चल रहा है।

गिंवाला के निवासियों से मिलकर हम आगे बढ़ गए एक और गांव के लिए….।

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