नींव अनाम है सदा

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उमेश राय

श्रम और प्रेम के बिना,
जीवन की अर्थवत्ता नहीं…
पर,मूल व मौलिक रहता है आधार,
भले ही दिखता नहीं..
दिखते हैं फल व फूल इतराते हुए,
कंगूरे जो हैं.

मेहनतकश बना है मजदूर आज,
श्रम का पलड़ा है उसके हिस्से में,
पर विश्राम का पलड़ा उसके लिए बना ही नहीं.

नारी श्रम का मूल्य नहीं,उपभोग है केवल,
बच्चे भी सुविधा के उत्पाद बन गए हैं,
सिमटी बेज़ार दुनियां में दुबके हुए.
सब कुछ बिकाऊ है यहाँ,
उत्पादक भी वस्तु है वास्तविकता में अब.

विपणन की मानसिकता संवेदन को महसूस ही नहीं कर पाती,
सृजन को जनना होता है स्व-रूपांतरण कर,
जो गुणन-आकलन का मन समझ ही नहीं सकता.

निर्माता चाहे माता हो या ईश्वर,
वे प्रेमपूर्ण श्रमिक रहे मनुष्यता के
प्राथमिक प्रस्थान के.
सर्जना का उत्स कर्म के अनुष्ठान व स्वेद-संवेद के सार से ही रचा जा सकेगा,
उत्सव… जीवंत जीवन-नव! ..

शोषण का जीवन रहेगा भीषण,
यह जानता भू का कण-कण…
स्नेह के ताप पर तप्त श्रम ही लिखेगा,
सच्चा सचेत सुंदरतम जीवन-रण.
पसीने की बूंद ही फलती
कला का आज व कल,
जीवन कला है काल के अंदर,
चलो इस पथ पर हर पल- हर पल.

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