परिवार के साथ समय की कीमत

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यह एक ऐसे पिता की कहानी है, जो बच्चों के लिए संघर्ष करते रहे, ताकि उनके बच्चों को किसी तरह की असुविधा न हो, लेकिन पिता की मेहनत और अपने कार्य में व्यस्त रहने की वजह से परिवार को हमेशा यही शिकायत रही कि वह उनको समय नहीं देते। 

एक व्यक्ति अपनी पत्नी और तीन बच्चों के भरणपोषण के लिए बहुत मेहनत करता था। दिनभर कार्य में व्यस्त रहने के बाद वह शाम को क्लास अटैंड करता था, ताकि खुद में इंप्रूवमेंट करके एक दिन इससे भी बेहतर नौकरी और सेलरी हासिल कर सके। रविवार को छोड़कर उसको अन्य किसी दिन अपने परिवार के साथ भोजन करने का मौका नहीं मिला। उसने नौकरी करने के साथ पढ़ाई भी जारी रखी, ताकि अपने परिवार के लिए बेहतर कर सके और उनके साथ ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत कर सके। 

एक दिन उसकी परीक्षा का रिजल्ट आया और उसने अच्छे अंक हासिल किए। वह बहुत खुश था, क्योंकि यह क्वालीफिकेशन उसको अच्छी जॉब और ज्यादा तनख्वाह दिलाने में मदद करेगी। उसको किसी दूसरी कंपनी में सीनियर सुपरवाइजर की जॉब मिल गई। 

उसका सपना सच हो गया, क्योंकि वह अब परिवार को अच्छे कपड़े, भोजन और यात्राएं करा सकता था। लेकिन परिवार को उसके साथ समय बिताने का मौका पहले से भी कम मिलने लगा। उसने पहले से भी ज्यादा मेहनत करना शुरू कर दिया, क्योंकि मैनेजर की पोस्ट पर तरक्की के लिए किसी कोर्स में दाखिला ले लिया था। मैनेजर की पोस्ट के लिए एक और कोर्स में श्रेष्ठता हासिल करनी थी। 

परिवार उससे अक्सर शिकायत करता कि वह उनके साथ समय नहीं बिताते। इस पर व्यक्ति का तर्क था कि वह सब कुछ तो उनके लिए कर रहा है। लेकिन परिवार अपनी जिद्द पर कायम रहा और वह व्यक्ति अपनी तरक्की की राह तैयार करने में व्यस्त। 

पदोन्नति का मौका मिला और वह मैनेजर बन गया। सेलरी बढ़ी और उसने परिवार के लिए सुविधाएं बढ़ा दीं। घर के कार्यों और पत्नी की मदद के लिए एक महिला कर्मचारी को नियुक्त कर दिया। एक नया घर खरीद लिया। परिवार सुविधाएं और सेवाओं से खुश था, लेकिन पिता से समय नहीं मिलने की दरकार बरकरार थी, क्योंकि जिम्मेदारियां बढ़ने की वजह से उनका रविवार भी व्यस्त रहता। अब वह पहले की तरह रविवार को भी उनको समय नहीं दे पाते।

वह अभी एक और प्रमोशन पाना चाहता था। इसके लिए कंपनी को अपनी परफारमेंस दिखाना और जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभाना था। दफ्तर के काम घर तक आ गए। समय बीतता गया, परिवार की ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी। शिकायत करने पर हमेशा वही पुराना जवाब मिलता, परिवार के लिए ही तो यह सब कुछ कर रहा हूं। 

एक प्रमोशन और मिल गया और साथ ही जिम्मेदारी भी पहले से ज्यादा हो गईं। हालांकि सेलरी बढ़ गई और परिवार की सुविधाएं भीं। उसने परिवार को बुलाया और कहा, अब और प्रमोशन नहीं। अपने परिवार को समय दूंगा। जीवन में बहुत मेहनत कर ली और जो चाहा था उसे हासिल कर लिया।

कुछ दिन सब कुछ ठीक चलता रहा और परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि वह पत्नी और बच्चों के साथ खुशी-खुशी समय बिता रहा था। उनके साथ खाना खा रहा था, उनके साथ घूमने जा रहा था और उनके साथ हंसी मजाक कर रहा था। एक दिन परिवार के साथ डिनर करके सोया यह पिता सुबह नहीं उठ पाया और परिवार के साथ किया उसका वादा पूरा नहीं हो सका। (अनुवादित)

यह बात सही है कि हम जो भी कार्य करें, उसमें ईमानदारी,निष्ठा और मेहनत का होना जरूरी है, लेकिन कार्यस्थल की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए परिवार की उपेक्षा करना सही नहीं है। आखिर में जो भी कुछ कर रहे होते हैं, वह परिवार की खुशियों के लिए ही होता है। इसलिए परिवार को भी समय दें। 

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