अपनी तनख्वाह बढ़वाने के लिए दूसरों का पैसा रुकवाने पर पूरा जोर

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देहरादून में कुछ दिन बिताने के बाद मुझे फिर से फोन करके धर्मशाला आने के लिए कहा गया। मैं इनके निर्देशों और आदेशों को मानने की गलतियां कर रहा था। इसकी वजह यह थी कि मैं अपने तीन साल के पत्रकारिता के करिअर को बर्बाद नहीं होने देना चाहता था। दूसरा सबसे बड़ा कारण था, मैं अब जिम्मेदार व्यक्ति हो गया था, मेरी शादी हो गई थी। मेरे पापा मुझे किसी भी मुश्किल में नहीं पड़ने देना चाहते थे। उन्होंने मुझे बहुत मना किया, पर मेरे सिर पर पत्रकारिता में कुछ बड़ा करने का जुनून सवार था, इसलिए किसी भी मुश्किल से जूझने के लिए फिर तैयार था। मेरे पास कुछ रुपये थे और सोचा कि एक माह की तनख्वाह मिलनी है, सबसे पहले बैंक में एकाउंट खुलवाऊंगा। फिर से शुरू करेंगे पत्रकारिता का एक और सफर।
एक बात मैंने जो अच्छे से महसूस की है कि अगर आप अपने माता-पिता की नहीं सुनते हैं तो तकलीफें झेलने के लिए तैयार हो जाएं। उनके अपने जीवन के बहुत सारे अनुभव होते हैं, जिनके आधार पर वो आपके पथप्रदर्शक हैं। वो आपके हृदय से शुभचिंतक हैं, इसलिए आपको डांटते और टोकते भी हैं, तो समझिए इसमें आपकी भलाई है।
एक बार फिर मैं धर्मशाला पहुंच गया। इस बार मेरे पास था केवल बिस्तरबंद। वहां एक किराये के कमरे में पहले से ही अखबार की सर्कुलेशन की टीम रह रही थी। टीम में शामिल युवा मेरे बहुत अच्छे परिचित हैं। मैंने वहां अपना डेरा जमा लिया। दो दिन बाद एक और शख्स, जो मुझसे आयु में लगभग दोगुने होंगे, वहां पहुंचे। मुझे बताया गया कि यह आपके इंचार्ज हैं। मैंने नमस्कार किया, पर उन्होंने मुझसे बात करने में कोई खास रूचि नहीं दिखाई। मैंने सोचा कि हो सकता है कि ये किसी से ज्यादा बात नहीं करते हों। हो सकता है कि ये बहुत बड़े पत्रकार हैं, जो ट्रेनियों से बात नहीं करते। पर मुझे तो इनके साथ यहां अखबार को बढ़ाने में सहयोग करना है। जब इतना झेल लिया तो यह क्या हैं।
अखबारों की ग्रुपिज्म की वजह से मैं हिमाचल प्रदेश के उस शहर से बाहर फेंक दिया गया था, जिसमें अखबार के दफ्तर और रिपोर्टिंग टीम, सूचना संपर्कों को खड़ा करने में मैंने जमकर मेहनत की थी। मैं उस शहर में अपने सपने पूरे करने गया था, मुझे क्या पता था कि ये अधेड़ उम्र के अधिकारीनुमा पत्रकार मुझे उस चश्मे से नहीं देखते, जैसे कि अपने छोटे भाइयों या बच्चों को देखा जाता है। इस चश्मे से इनको मेरा स्ट्रगल नहीं दिखा था। मेरा कसूर केवल यही था कि मुझे ये अपने विरोधी गुट का हिस्सा मानते थे।
मेरे नये इंचार्ज ने मेरा इंटरव्यू शुरू कर दिया। वो परखना चाहते थे कि ये खबरें लिखना औऱ रिपोर्टिंग जानता भी या यूं ही किसी ने भेज दिया। मेरे से पूछा, कितने साल का करिअर है। मैंने जवाब दिया साढ़े तीन साल का। कहां-कहां काम किया। मैंने बताया, देहरादून, ऋषिकेश, मंडी में और अब यहां। क्या पोस्ट है तुम्हारी। मैंने कहा, मैं ट्रेनी हूं, पर इससे पहले मंडी जिला में काम किया है। उनका कहना था, ठीक है, देखते हैं यहां कितने दिन काम कर पाते हो। पर, मेरे लिए यह बहुत अच्छी बात थी कि वो व्यक्ति किसी भी ग्रुप का मेंबर नहीं थे। इसकी वजह थी कि वो इनमें से किसी को नहीं जानते थे। उन्होंने यूपी और पंजाब में बहुत काम किया था।
वो धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और मंदिरों में दर्शनों के लिए जाते थे। सुबह काफी समय तक पूजा पाठ करते थे। बातचीत का क्रम जारी रहा और धीरे-धीरे उनके साथ दोस्तों जैसा वार्तालाप होने लगा। मैं भी उनके साथ मंदिरों में जाता। वो राजनीति की खबरों पर फोकस करते। उन्होंने मुझे छोटे भाई की तरह पत्रकारिता की कुछ बातों का ज्ञान कराया। हम दोनों शाम को खबरें भेजने के लिए मैकलॉडगंज जाते। लगभग दस किमी. दूर जीप से रोजाना शाम को वहां जाते और फिर रात को वापस लौटते।
उस समय अखबार का दफ्तर नहीं खुला था। हमारे पास कंप्यूटर नहीं थे। मैक्लॉडगंज में साइबर कैफे पर महीने के हिसाब से तय हुआ था। वो दो कंप्यूटर शाम को खाली छोड़ देता था। आसपास के स्टेशनों के रिपोर्टर वहीं पर फैक्स से खबरें भेजते थे। मुश्किल से दो-ढाई घंटे में कुछ खबरों को वहां से भेजते थे। मैक्लॉडगंज जाने और वहां से आने का खर्चा भी जेब से देना पड़ता था। उसका भी कोई पैसा कंपनी से नहीं मिलता था।
पत्रकारिता की पाठशाला
अखबार का दफ्तर खोलने के लिए किराये पर भवन मिल गया। हम दोनों उसी भवन में फर्श पर बिस्तर बिछाकर रहने लगे। मेरे पास पैसे खत्म हो गए। मेरी तनख्वाह भी नहीं भेजी गई थी। मैंने चंडीगढ़ में संपादकीय के उस अधिकारी से बात की, जो रोजाना दिशा निर्देश जारी करते थे। उनका जवाब सुनकर मुझे लगा कि अब हालत पहले से भी ज्यादा खराब होने वाली है। उनका कहना था कि तुम्हें पैसों की क्या जरूरत है, तुम तो यहां वहां घूमते रहते हो। मैंने कहा, एक माह से धर्मशाला में ही पड़ा हूं। चेक भेजोगे तो बैंक में खाता खुलवाऊंगा। पैसे नहीं हैं मेरे पास। उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा। मैंने अपने इंचार्ज से कहा, तो उनका कहना था कि पैसे तो वो ही भेजेंगे। मैं खाने पीने में तुम्हारी मदद कर सकता हूं।
हालात खराब होने लगे। धर्मशाला तो टूरिस्ट का शहर है, वहां मंडी की तुलना में एक समय का खाना लगभग 35 से 50 रुपये में बैठता था, वो भी तब, जब मैंने पूरे जीवन में सादा खाना ही खाय़ा। मैंने नॉनवेज को तो आज तक हाथ नहीं लगाया। न ही मुझे सिगरेट, शराब का शौक था और न अब है। दिन का खाना लगभग खत्म सा हो गया, क्योंकि इसको मैंने दस रुपये के बजट तक सीमित कर दिया था। कभी कभार शाम का खाना अपने इंचार्ज के साथ खाता, तो समझता कि आज के पैसे बच गए।

कितनी खराब बात है, जब आप किसी संस्थान के लिए काम करते हैं और आपको अपनी मेहनत का पैसा मांगने के लिए गिड़गिड़ाना पड़े। मैं फिर से घर लौटकर शर्मिंदा नहीं होना चाहता था। कोई मदद नहीं थी। नौकरी में जमकर मेहनत करने के बाद भी आपको किसी दूसरे से खाने पीने के लिए पैसे मांगने पड़ें तो इसे किस्मत खराब है, ही कहा जाएगा। मेरा पैसा मालिक के स्तर से नहीं रोका गया था, मुझे मालूम है। उनके पास हर किसी के हिसाब किताब की फुर्सत कहां होगी। पैसा रोकने में वहीं लोग पूरा जोर लगाते हैं, जो अपनी तनख्वाह बढ़वाना चाहते हैं।
एक शाम खाना खाने के बाद मैंने मां से बात करने के लिए फोन मिलाया। मां को फोन पर नहीं पाया। पत्नी ने मुझे बताया कि मम्मी पड़ोस में किसी के घर गई हैं। मैंने कहा, ऐसा नहीं हो सकता, सच बताओ कहां हैं। मेरे पास समय नहीं है, फोन का बिल बढ़ रहा है, जल्दी बताओ। जवाब मिला, मम्मी अस्पताल में हैं, बड़े भाई का एक्सीडेंट हो गया है। वो दो दिन से अस्पताल में भर्ती हैं। मैं कुछ देर के लिए सन्न पड़ गया। मेरे काटो तो खून नहीं सी हालत हो गई। मैं तो यहां तनख्वाह का इंतजार कर रहा था, अब मेरे पास तो इतने पैसे नहीं हैं कि धर्मशाला से देहरादून पहुंच जाऊं।
मैं उस रात नहीं सो पाया। दूसरा दिन भी धर्मशाला में अखबार के लिए खबरें तलाश रहा था। शाम को मैक्लॉडगंज जाकर खबर लिख रहा था। वो दिसंबर 1999 का महीना था। मैंने हिम्मत करके फिर चंडीगढ़ फोन किया कि मुझे पैसे भिजवा दो। देहरादून में भाई का एक्सीडेंट हो गया है। मुझे घर जाना है। उस दिन कोई जवाब नहीं मिला।
दूसरे दिन फिर, पैसों के लिए और घर जाने की अनुमति के लिए फोन किया, तो जानते हैं, क्या जवाब मिला। उनका कहना था कि कुछ दिन बाद चले जाना, अभी तुम्हारे जाने से क्या भाई ठीक हो जाएगा। मेरा जमीर जाग उठा, सोचा किन लोगों के सामने गिड़गिड़ा रहा हूं। मैंने साफ शब्दों में ऐलान सा कर दिया, अखबार में रहते हुए ही तो आपसे अनुमति चाहिए, जब अखबार में नहीं रहूंगा तो अनुमति की कोई जरूरत नहीं। मैं कल देहरादून वापस जा रहा हूं। शायद फिर कभी यहां वापस नहीं आऊं।
मैंने अपने इंचार्ज को पूरी बात बताई। उनका कहना था कि तुम चले जाना भाई को देखने। फोन पर हालचाल पूछते रहो। वो जल्दी ठीक हो जाएंगे। नौकरी मत छोड़ो। मेरी आंखें नम थीं, मैंने कहा, सर मुझे ऐसी नौकरी नहीं करनी, जहां कोई किसी के कष्ट को न समझें। मैं आपके साथ कितने दिन से काम कर रहा हूं। आपके हर निर्देश का पालन किया, खबरें लेकर आता हूं। पूरा दिन पैदल चलता हूं धर्मशाला की इन ऊंचाई और ढलान वाली सड़कों पर। मैंने कोई शिकायत नहीं की। मैंने इनसे अपना पैसा ही तो मांगा था। उन्होंने मुझसे कहा, तुम फिर आना, जब तक चाहो, अपने घर रहो।
मैं अपना बिस्तरबंद वहीं छोड़कर देहरादून की ओर जाने के लिए कांगड़ा की बस में बैठ गया। मैंने बिस्तरबंद इस उम्मीद में छोड़ा कि, हो सकता है फिर आना पड़े। मेरे पास मात्र दस रुपये थे, जो मुझे केवल कांगड़ा तक ही पहुंचा सकते थे। आगे क्या होगा, देखा जाएगा…।
मैं कांगड़ा पहुंचा। वहां देहरादून के ही रहने वाले एक मित्र के पास पहुंचा, वो कांगड़ा में रिपोर्टर थे। उनको अपनी व्यथा बता दी। उन्होंने मुझे खाना खिलाया। वो जानते थे कि इसने खाना भी नहीं खाया होगा। मैंने उनसे डोईवाला तक का किराया मांगा। उन्होंने मुझे ढाई सौ रुपये तत्काल दे दिए। यहां वो अधिकारी काम नहीं आए थे, जिनके हर हुक्म को हम किसी गुलाम की तरह पूरा करते थे। यहां एक साथी काम आया था। उन साथी का नाम है सुनील डोभाल। डोभाल जी, इस समय हरिद्वार में तैनात हैं। मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने डोभाल जी के वो 250 रुपये आज तक नहीं लौटाए। उस समय के लगभग 13 साल बाद उनसे देहरादून में मुलाकात हुई थी।
देर रात को घर लौटा। पापा ने साफ शब्दों में कह दिया, अब कहीं नहीं जाओगे। मैंने भी सोचा, अगर देहरादून या आसपास नौकरी मिल गई तो ठीक है, नहीं तो कुछ और करेंगे। अब मैं पूर्ण रूप से बेरोजगार हो गया था। जब मैंने चंडीगढ़ में नौकरी छोड़ने का फोन कर दिया तो कुछ दिन बाद एक महीने की सेलरी का चेक घर पहुंच गया। क्या करना था, इस चेक का, जब जरूरत थी, तब नहीं मिला। अब तो घर पर मां- पिता के साथ हूं तो मुझे पैसों की जरूरत नहीं थी।
कुछ माह में ये पैसे भी खर्च। कब तक बेरोजगार रहूंगा। तीन माह ही हुए थे शादी को। पर मुझे जीवनसाथी बहुत अच्छी मिली हैं। उन्होंने, आज नहीं तो कल अच्छा होगा, की उम्मीद को हमेशा जगाकर रखा। मैंने एक बार फिर देहरादून दफ्तर में जाकर फिर से ऋषिकेश में नौकरी दिलाने की गुहार की। मुझे साफ मना कर दिया गया कि अब कुछ नहीं हो सकता। किसी दूसरे अखबार में ज्वाइन कर लेना।
मैं बहुत कुछ सीख चुका था और चाहता था कि बतौर ट्रेनी मेरे साढ़े तीन साल खराब न हों। इसलिए इसी अखबार में ज्वाइन करूंगा। कहने दो, जो कोई कुछ कहता है। मैंने जिद ठान ली कि अब ज्वाइनिंग होगी तो फिर से इसी अखबार में। एक अधिकारी ने मुझसे कहा, एक बार छोड़ने के बाद यहां नौकरी नहीं मिल सकती। पर कहते हैं कि उम्मीद सबसे बड़़ी होती है। उम्मीद को कभी मत खोना।
अब इतना ही, काफी देर हो गई है। आपको बताऊंगा, ठीक छह माह बाद मैंने इसी अखबार में अपनी पारी को फिर से शुरू किया। यह किसी अधिकारी की वजह से नहीं, बल्कि किसी और वजह से हुआ। कल की मुलाकात में आपको बताता हूं….।

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