मेरे गांव की सड़क

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एक वक्त
जब नहीं थी मेरे गांव में सड़क
मुश्किलों से भरा होता था रास्ता
और धार* के उस पार थे
बाज़ार , हस्पताल और सड़क

तब मेरे गांव के लोग
जुड़े थे एक दूसरे के सहयोग से
तब आस पास के गांव जाने में
नहीं लगती थी थक
बल्कि होता था उल्लास

अपने ही दूसरे परिवार से मिलने का
एक धार* पर एक साथ
खड़ा हो जाता था पहाड़
पहाड़ की मुश्किलें बांटने के लिए

तब बच्चे जाते थे दूर स्कूल
बनाते हुए चार पांच गांव से रिश्ता
शरारतों से भरा सफ़र और
गुरजी का आदर…

वो दूर का स्कूल करता था उनके भीतर
प्रकृति , समाज, ज्ञान , प्रेम और
पहाड़ का समन्वय

मगर जब उस दिन
आई मेरे गाँव में सड़क
तो साथ लाई शहर की गंध
एक ऐसी गंध
जिस पर मोहित होकर
एक एक कर गांव छोड़ गए 
मेरे गांव के लोग
कभी न लौटने के लिए

और जो बच गए
वो भी इसी उम्मीद में है कि
किसी दिन कोई आयेगा और
वे भी चले जाएंगे
उसी सड़क से शहर की ओर….

और इसके बाद
अब भी मौजूद है मेरा सड़क वाला गांव
कुछ शहर वालों की याद में और
कुछ खंडहरों में…..

#निकिता

*1- पहाड़ के दूसरी तरफ

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