अखबार में सूत्र और स्रोत तथा खबरों का संपादन

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यहां खबरें संपादित करने वाला रिपोर्टर से कम जानकार भी हो सकता है
अब हम पत्रकारिता में सूत्रों और स्रोतों पर बात करेंगे। अक्सर आप पढ़ते हैं सूत्रों के अनुसार। हालांकि अब सूत्रों के अनुसार, बहुत कम लिखा जाता है। ये सूत्र कुछ नहीं होते, जो बात कुछ रिपोर्टर को सुनी सुनाई लिखनी होती है, उसमें सूत्रों का हवाला दिया जाता है। ऐसा अक्सर होता है। हां, कभी कभार कुछ लोग अपना नाम नहीं बताने की हिदायत दे देते हैं तो ऐसा लिखा जाता है। यदि किसी अखबार से किसी सक्षम अथारिटी द्वारा यह पूछ लिया जाए तो जवाब देते नहीं बनेगा, यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं। इसलिए किसी भी खबर का अधिकृत स्रोत से आना जरूरी है। अगर, खबर अधिकृत स्रोत से नहीं है तो इसकी पुष्टि अधिकृत अधिकारी से होनी चाहिए। नहीं तो खबर को बिना तथ्यों और पुष्टि के प्रकाशित न किया जाए। किसी भी खबर को हवा में लिखने का कोई मतलब नहीं है।
अखबारों में खास तरह से दो तरह की खबरें होती हैं, एक तो वो जो संबंधित द्वारा विज्ञप्ति जारी करके दी जाती हैं। दूसरी वो, जिन्हें रिपोर्टर अपने प्रयासों से तलाशते हैं। पहली वाली खबर में स्रोत वहीं होते हैं, जो विज्ञप्तियों को जारी करते हैं। ये खबरें कोई सूचना, जानकारी हो सकते हैं, किसी का वक्तव्य हो सकता है, किसी की मांग, ऐलान हो सकते हैं, किसी के आदेश, निर्देश हो सकते हैं। किसी कार्यक्रम, बैठक या गतिविधि या फिर कोई समस्या या फिर किसी का आरोप प्रत्यारोप हो सकता है या फिर किसी व्यवस्था संबंधी जानकारी हो सकती है। सरकार भी सूचना विभाग के माध्यम से मुख्यमंत्री से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों की बैठकों या कुछ खास फैसलों या निर्देशों आदि की विज्ञप्तियां जारी करती है।
पहले ये पेपर पर जारी होती थीं, अब ईमेल या व्हाट्सएप पर जारी होती हैं। पूर्व में इनको बाकायदा टाइप किया जाता था, इसमें बहुत समय लगता था। अब तो सीधा एडिट किया जाता है, जिसमें कोई दिक्कत नहीं होती और विज्ञप्ति को अखबार में प्रकाशित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। कुछ लोग अब भी विज्ञप्तियों को लेटरहेड पर उतारते हैं और फिर उसके फोटो खींचकर व्हाट्सएप से भेजते हैं।
अगर कोई बहुत महत्वपूर्ण खबर न हो, तो अक्सर इस तरह विज्ञप्तियों के प्रकाशन की संभावना काफी कम हो जाती है। अगर प्रकाशित भी होती है, तो बहुत छोटी होती है। समय की कमी की वजह से रिपोर्टर इनको पढ़कर टाइप नहीं करते, जितना समझ में आता है, उतना लिखा और बढ़ा दिया डेस्क की तरफ। एक बात ओर, अखबारों को भेजी जाने वाली विज्ञप्ति में भाषा बहुत सरल और संवाद वाली होनी चाहिए। कई बार सरकारी विज्ञप्तियों में अक्सर बहुत कठिन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, जो सामान्य तौर पर बहुत मुश्किल से समझ में आते हैं।
खैर, एक तरह के स्रोत के बारे में आपको बता दिया, जिसको बनाने में कोई ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। दूसरा स्रोत बनाना वास्तव में रिपोर्टर के लिए बहुत कठिन है। किसी नई बीट पर काम करने वाले रिपोर्टर के सामने सबसे बड़ी दिक्कत होती है, वहां अपने स्रोत विकसित करना। किसी भी दफ्तर में कोई भी स्रोत, बहुत जल्दी रिपोर्टर पर विश्वास नहीं करता। वो पहले आपको वॉच करेंगे और फिर कोई सूचना देंगे। संबंधित विभाग से जुड़े संगठनों के पदाधिकारी या सदस्य भी खबरों के स्रोत हो सकते हैं। अधिकारी या कर्मचारी कोई भी, आपको सूचनाएं दे सकते हैं।
यह आपको तय करना है कि सूचना कितनी सही है। स्रोत का नाम आपको गोपनीय रखना होता है, यह पत्रकारिता का नियम है। हां, आपको उनसे मिलने वाली सूचनाओं की सत्यता का पता लगाना चाहिए। कहीं ऐसा न हो जाए कि कोई गलत सूचना किसी निर्दोष का अहित कर दे और आपकी खबरों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दें। किसी भी खबर का संतुलित होना बहुत जरूरी है। संतुलित होने का मतलब है- खबर को एक पक्षीय नहीं होना चाहिए। आप संबंधित सभी पक्षों की बात लिखिएगा। बिना तथ्यों के कोई खबर नहीं लिखनी चाहिए। अगर सुनी सुनाई बातों पर कुछ लिख दिया तो जवाब देते नहीं बनेगा।
स्रोत को लेकर अभी और जानकारियां हैं, जो समय के साथ-साथ आपके साथ चर्चा में शामिल होती रहेंगी। फिलहाल कुछ बातें, खबरें लिखने, संपादित करने, उनके प्रस्तुतीकरण पर। पहले बात करते हैं आंकड़ों से भरी खबरों की।
आंकड़ें खबरों को पुष्ट बनाते हैं, लेकिन इनको प्रस्तुत करने के लिए टेबल या ग्राफिक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अक्सर, देखने में आता है, टैक्सट में इतने आंकड़ें हो जाते हैं कि समझ में ही नहीं आता कि कहना क्या चाहते हैं। यह खबर है गणित का कोई कठिन सवाल। पढ़ने वाला खबर को छोड़ देता है। ऐसे में खबर को लिखना, संपादित करना और प्रकाशित करना, बेकार साबित होता है। आंकड़ों को ग्राफिक से समझाइए। ग्राफिक खबरों को प्रेजेंटेबल बनाते हैं।
आप रिपोर्टर हैं या डेस्क पर तैनात, आपको आंकड़ों का विश्लेषण करना आना चाहिए। आंकड़े, जिस भी विषय से संबंधित हैं, उस विषय की अच्छी जानकारी आपको होनी चाहिए। अगर, समझ में नहीं आता तो रिपोर्टर से पूछने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। खबरों को पढ़ने लायक और विश्वसनीय बनाने के लिए आपको मेहनत भी करनी होगी और जूनियर या सीनियर की इगो से बाहर आकर सोचना होगा।
अक्सर मीडिया में एक वर्ग झूठी इगो वालों का होता है, जिनको आता भी नहीं है और पूछना भी नहीं है। ऐसा करके ये लोग अखबार को कचरा बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। इगो व्यक्तिगत कार्यों के लिए पालिएगा, कोई हर्ज नहीं है। अखबार तो सार्वजनिक हित के लिए होता, उसको अपनी इगो से नुकसान नहीं पहुंचाओ।
एक और खास बात, किसी के पास खबरों को पढ़ने का समय नहीं है, खबरें अब पढ़ने की नहीं बल्कि देखने की श्रेणी में आ गई हैं। अधिकतर पाठक खबरों के खास प्वाइंट देखते हैं और समझ जाते हैं क्या है। जिनको इनसे जिज्ञासा होती है, वो पूरी खबर को भी पढ़ जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि खबरों की भाषा आम बोलचाल वाली हो, ताकि संवाद बनाने में कोई दिक्कत न हो। वाक्य छोटे हों। एक ही तथ्य को अलग-अलग तरह से प्रस्तुत करने जैसा रीपिटेशन न हो। वाक्य उलझाते न हों। आपकी बात का प्रवाह बना रहे। जिज्ञासा जारी रहे। हिन्दी के कठिन शब्दों के स्थान पर अंग्रेजी के वो शब्द इस्तेमाल करें, जो सामान्य रूप से बोलते हैं।
हमें हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि तथ्य हाथ में हों, तो खबर आसानी से प्रकाशित होती है। आधे अधूरे तथ्यों के आधार पर लिखी गई खबर में न तो कोई प्रवाह होता है और न ही उसका प्रभाव होता है, यह एकदम सत्य बात है। आधे अधूरे, अधकच्चे तथ्य तभी होते हैं, जब रिपोर्टर फील्ड में नहीं गया हो या उसको विषय की जानकारी नहीं हो या फिर वो किसी दबाव या प्रभाव में, बस प्रकाशित होनेभर के लिए खबर लिख रहा है।
एक बात और, जो बहुत महत्वपूर्ण है कि डेस्क पर बैठने वाला हर शख्स सभी विषयों को ज्ञाता हो, यह संभव नहीं हैं। कई बार उन लोगों को राज्य स्तरीय राजनीति या शासन की कार्यप्रणाली की खबरों की स्क्रीनिंग करने का जिम्मा मिल जाता है, जिन्होंने कभी गांव या शहर के विकास का सिस्टम को नहीं देखा। दस साल के अनुभव वाले रिपोर्टर की कॉपी को दो साल के अनुभव वाला ट्रेनी या सब एडिटर जांचता है।
चलिए मान लेते हैं कि ऐसा हो सकता है। इसमें, अक्सर यह होता है कि उसको जो समझ में आता है, वो उसी हिसाब से संपादन करता है। कभी ऐसा भी हो जाता है कि सीनियर की खबर है, कहीं कुछ गलती न हो जाए, तो उसको महज बिंदी, मात्रा संपादित करने तक सीमित रखा जाता है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए, खबर का जो हिस्सा संपादित होने लायक है तो उसको संपादित करने में क्या दिक्कत है। आपके पास तर्क होना चाहिए। यह तर्क तभी पेश कर सकते हैं, जब जानकारी होगी।
माफ करना, यह बहुत कड़वी बात कह रहा हूं, जिन लोगों को अधिशासी अभियंता और अधीक्षण अभियंता, एसडीएम और एडीएम, सचिव और प्रमुख सचिव, बीडीओ और एडीओ, बीईओ और सीईओ, न्याय पंचायत और ग्राम पंचायत, एलआईयू और आईबी, नगर पंचायत और नगर पालिका, परिवहन निगम और परिवहन विभाग, कृषि और उद्यान, जल संस्थान और जल निगम, पीएचसी और सीएचसी, स्वास्थ्य और चिकित्सा, नहर और नदी, पुलिस उपाधीक्षक और पुलिस अधीक्षक, डैम और बैराज… जैसे बहुत सारे पदों, विभागों, स्थानों और रोजाना इस्तेमाल होने वाले शब्दों की जानकारी नहीं है, उनसे इन विषयों की कॉपियां चेक कराई जाती हैं।
मैं एक बात फिर दोहराऊंगा कि मीडिया की डेस्क पर हमेशा रिपोर्टिंग के अनुभव वालों को जिम्मा देना चाहिए। फीचर लिखना पत्रकारिता का एक आयाम हो सकता है, लेकिन ये रूटीन की खबरों से एकदम अलग काम है। आपको शब्दों का जाल बनाना आता है और आप एक ही विषय के कुछ कन्टेंट को पिरोना जानते हैं, आप मुहावरों और लच्छेदार, जलेबियों वाली भाषा जानते हैं, तो मेरी समझ में खबरों की डेस्क पर आपको कोई काम नहीं है। मैं यह भी मानता हूं कि खबरों को एक फ्रेम में फिट किया जाता है, जो कि किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता।
मैंने एक बहुत सीनियर पत्रकार को देखा है, जो केवल हिमालय की चोटियों पर बर्फबारी से प्राकृतिक सौंदर्य, पर्वतीय क्षेत्रों में कल-कल बहती नदियों से गांवों के सौंदर्य और पर्यटन स्थलों में खिलते फूलों पर फीचर लिखते लिखते बड़े पत्रकार बन गए। उन्होंने फिर रूटीन की पत्रकारिता और पत्रकारों को भी ऐसा ही लिखने के लिए प्रेरित किया। खबरों में फीचर राइटिंग का प्रवेश, वाह…।
आप डेस्क के लिए इंटरव्यू देने जाते हैं तो आपसे खबरों के बारे में कम और पेज डिजाइन करने के बारे में ज्यादा जाना जाता। क्या किसी सब एडिटर को डिजाइनिंग भी आनी चाहिए। डेस्क के साथी को, लेआउट और महत्व के अनुसार, खबरों के प्लेसमेंट तक, पेज को प्रेजेंटेबल बनवाने तक, पेज के मास्ट से लेकर बॉटम तक, उसके इन और आउट तक, पेज के हर हिस्से की जानकारी तथा फोटो की क्रापिंग तक, फोटो कहां लगाना चाहिए, कैसे लगाना चाहिए तक की जानकारी तक। मेरा मानना है, इससे ज्यादा की जरूरत नहीं है। इससे आप पेज डिजाइनिंग टीम को फ्रेम खींचकर दे सकते हैं।
अखबारों में यह अपेक्षा की जाती है डेस्क के सभी साथी पेज स्वयं बनाएं। इन हालात में कुछ लोग पेज बनाने में दक्ष हो गए। उनको समय पर पेज छोड़ना है, ऐसी स्थिति में कंटेंट पर कम ही ध्यान जाता है। संपादन करने वाले अधिकतर सााथियों को पेज डिजाइन करने में लगा दिया।
कल बात करेंगे अखबारों में मैनेजमेंट के दखल की। यह दखल कितना सही है और कितना खराब। मैनेजमेंट तभी हावी होता है, जब संपादकीय के कुछ लोग उन पर निर्भर हो जाते हैं और उनकी जी हुजूरी करते हैं। आखिरकार किसी भी मीडिया संस्थान में पत्रकारिता का मतलब नौकरी होता है। नौकरी को बचाने की चुनौती और प्रमोशन की चाह, कुछ लोगों के लिए अहम हो जाते हैं।

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