खाराखेत और नियोविजनः बच्चे बोले, हम तो इतिहास के बहुत करीब पहुंच गए

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बस देहरादून शहर में आगे बढ़ रही थी। बस में नियोविजन के बच्चे सवार थे, जो अपनी संस्था का छठां स्थापना समारोह मनाने के लिए खाराखेत जा रहे थे। एक बच्चे ने सोचा कि कुछ मजाक ही कर लिया जाए। उसने कहा, आप तो सबसे पूछते हो कि पेड़ घूमने क्यों नहीं जाता, पर ये पेड़ तो हमारे साथ घूमने जा रहे हैं, देखो बस में कितने मजे से बैठे हैं।

उसकी इस बात पर सब हंसने लगे। बहुत अच्छा लगा कि बच्चों को पेड़ वाला सवाल याद है। तभी एक बच्चा बोला, ये हमारे साथ खाराखेत जा रहे हैं, वहां इनकी जरूरत है। जब हम इन्हें लगा देंगे, फिर ये कहीं नहीं जाएंगे। तभी दूसरा बच्चा बोला, शहर में पेड़ों की बहुत जरूरत है। शायद, इन्होंने सोचा होगा कि बच्चों को आक्सीजन चाहिए, इसलिए हमारे साथ बस में बैठ गए। आपस में हंसी मजाक का यह विषय वाकई कितना गहरा है।

मैती आंदोलन के जनक कल्याण सिंह रावत जानते हैं कि आने वाले कल के लिए पेड़ कितने जरूरी हैं, इसलिए तो अब तक शादी विवाह, जन्मदिन और अन्य अवसरों तथा पितृ के नाम पर उत्तराखंड और इससे बाहर लगभग पांच लाख पौधे लगवा चुके हैं। रावत जी का यह विराट अभियान अनंतकाल तक जारी रहेगा, ऐसा हम सभी मानते हैं।

एक बार हमने सोचा कि ये पौधे रावत जी के पीछे पीछे चलते हुए मानो कह रहे हैं कि जहां जरूरत है, हमें वहां लगवा दो। इस बार पौधे खाराखेत जा रहे हैं, जहां उनको स्वतंत्रता सेनानियों और देहरादून में नून नदी के किनारे नमक सत्याग्रह की स्मृतियों का वन तैयार करना है।

मानवभारती के निदेशक डॉ. हिमांशु शेखर के साथ तक धिनाधिन की टीम नियोविजन के वार्षिक समारोह में शामिल हुई। इस समारोह को खाराखेत और नून नदी के गौरवशाली अतीत को जानने, वर्तमान को समझने और शानदार भविष्य का तानाबाना बुनने की शुरुआत कहें तो ज्यादा बेहतर होगा।

हालांकि खाराखेत के इतिहास और नून नदी के महत्व को सामने लाने की कोशिश अनवरत जारी हैं। इन्हीं कुछ प्रयास और योजनाओं को सुनने और समझने के लिए हम रविवार को खाराखेत में थे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मैती आंदोलन के जनक कल्याण सिंह रावत, पर्यावरण के पैरोकार रिटायर्ड शिक्षक बलवंत सिंह नेगी, हिमालयी क्षेत्र में जनसरोकारों की मुहिम चला रहे रतन सिंह असवाल, वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल, दिलीप सिंह रमोला, सीता देवी, नियो विजन के संस्थापक सॉफ्टवेयर इंजीनियर गजेंद्र रमोला, सिविल सर्विसेज प्रतियोगिता के जानकार अभिषेक वर्मा, नियोविजन से रेखा बलूनी, नरेंद्र रमोला, मयूर गुप्ता के साथ काफी संख्या युवा और बच्चे खाराखेत पहुंचे।

खाराखेत देहरादून शहर से लगभग 22 किमी. दूर चकराता रोड पर है। प्रेमनगर से आगे नंदा की चौकी के पास पौंधा रोड पर आगे बढ़ जाएं। बहुत सुंदर और शांत इलाका है यह। इस रूट पर कुछ एजुकेशनल व ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, स्कूल, हॉस्टल भी हैं।

खाराखेत पहुंच गए। बस को कुछ पहले ही रोककर बच्चों ने पौधों को उठाया और लगभग आधा किमी. की ट्रैकिंग करके उस स्थान के मुख्य द्वार पर पहुंचे, जिसे महात्मा गांधी नमक सत्याग्रह आंदोलन स्मारक स्थल के नाम से जाना जाता है। देहरादून वन प्रभाग का बोर्ड बता रहा है कि वन विभाग ने इस स्थान का सौंदर्यीकरण किया है। मुख्य द्वार के पास ही सीमेंट का चबूतरा बना है। सभी बच्चों ने पौधों को वहां रखा और आसपास कुदरत की सौगातों को निहारने लगे।

साल के ऊंचे पेड़ अपने बीजों को हवा की मदद से दूर-दूर तक फैलाने की कोशिश करते दिखे। फिरकीनुमा स्ट्रक्चर वाले ये बीज दिखने में फूल लगते हैं, जो हवा में स्पिन होते हुए कहीं भी गिर जाते हैं। बहुत सारे बीजों को इकट्ठा करके हवा में उछालने का मौका किसी नहीं छोड़ा, चाहे बच्चे हो या युवा या फिर बुजुर्ग। हमने बहुत सारे नन्हें पौधों को देखा, जिनको किसी ने रोपा नहीं है, बल्कि ये स्वयं उग आए। हमारी समझ में आ गया कि प्रकृति अपने सौंदर्य और सौगातों के लिए किसी का इंतजार नहीं करती है।

नियोविजन के बारे में कुछ बताना चाहता हूं। नियोविजन वो संस्था है, जिसने शिक्षा को बहुत सारे बच्चों और परिवारों की पहली आवश्यकता बना दिया है। ये बच्चे स्कूल जाते हैं और शाम को नियोविजन की क्लास में अपने सपनों को यर्थार्थ में बदलने के लिए जी जान से जुटते हैं। इनमें में कोई आईएएस बनना चाहता है तो कोई आईपीएस, किसी ने डॉक्टर बनने का सपना देखा है और किसी ने इंजीनियर।

कोई खेल के मैदान में तो कोई विज्ञान के क्षेत्र मे देश का नाम रोशन करना चाहता है। किसी ने शिक्षक बनने का सपना देखा है तो किसी ने सेना में शामिल होने का। आज हर बच्चे का अपना सपना है, जिसको देखने में मदद की है नियो विजन के संस्थापक गजेंद्र रमोला ने, वो भी खुली आंखों से। देहरादून के लक्खीबाग इलाके की तंग गलियों से होकर जाता है नियोविजन के क्लासरूम का रास्ता।

फिर से खाराखेत की यात्रा पर आते हुए। यहां से करीब तीन सौ मीटर नीचे है एक मैदान, जिस पर नमक सत्याग्रह आंदोलन का स्मारक है और नजदीक ही एक नदी, जिसे नून नदी कहा जाता है। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने स्मारक स्थल पर सफाई अभियान चलाया और पौधों को लगाने के लिए खुदाई शुरू कर दी गई।

इसी दौरान हमारे बीच पहुंचे करीब 63 वर्षीय गांधीवादी सर्वोदयी नेता बिजू नेगी, जिनका सभी को इंतजार था, क्योंकि सभी उनसे नून नदी और खाराखेत के अतीत और महत्व को जानने के उत्सुक थे। नेगी जी ने सबसे पहले नदी में इकट्ठा जल को जीभ पर रखते हुए पूछा, बच्चों इसका स्वाद कैसा है। कुछ बच्चों ने अंगुली से पानी को छुआ और चखा। फिर सभी बोले, यह तो नमकीन है।

नेगी जी ने यहीं से अपनी बात शुरू करते हुए कहा, मेरी जानकारी के अनुसार देश में दो ही नदियां ऐसी हैं, जिनका जल नमकीन है। एक यह नून नदी और दूसरी उड़ीसा की एक नदी। साथ ही यह भी बता दूं कि अभी हमारी जानकारी में यह तथ्य स्पष्ट नहीं है कि इसका पानी नमकीन किन वजहों से है।

शायद, इस नदी का जल सौ मीटर या फिर इससे कुछ ज्यादा बहाव क्षेत्र तक ही नमकीन स्वाद वाला होता है। नदी के जल से इसके पत्थरों पर नमक की परत चढ़ जाती हैं। उन्होंने बच्चों से पूछा कि नून का मतलब क्या है, सभी बच्चों ने कहा, नमक। खारा का अर्थ पूछा तो जवाब मिला, नमकीन। बताया कि नून नदी और खाराखेत में यह समानता है, जो सबकी समझ में आती है।

सर्वोदयी आंदोलनकारी नेगी जी ने बताया कि वह 2014 से यहां आ रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देहरादून में नमक सत्याग्रह का महत्व बहुत ज्यादा है, लेकिन इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इस महान आंदोलन में देहरादून की भूमिका को पहचान दिलानी होगी। बताते हैं कि 1930 में महात्मा गांधी जी ने नमक कानून के खिलाफ सत्याग्रह शुरू किया था।

देहरादून के वीर खड़क बहादुर सिंह जी ने गांधी जी के नमक सत्याग्रह में भाग लिया और उनकी अनुमति से 20 अप्रैल 1930 को खाराखेत में नमक बनाकर कानून तोड़ा। इस सत्याग्रह में शामिल स्वतंत्रता सेनानियों में महावीर त्यागी जी भी शामिल थे, जिनके नाम पर प्रिंस चौक के पास त्यागी रोड का नामकरण किया गया है। त्यागी जी सांसद और केंद्रीय मंत्री भी रहे।

नेगी जी ने बताया कि नमक कानून के खिलाफ सत्याग्रह करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को कोर्ट में पेश किया गया। जज ने सभी को सजा सुना दी। महावीर त्यागी जी ने पूछा, आप यह कैसे कह सकते हैं कि हमने नमक कानून तोड़ा है। जज ने कहा, आपके पास नमक की पुड़िया मिली है। आप जानते हैं कि सरकार की परमिशन के बिना आप नमक नहीं बना सकते। त्यागी जी ने कहा, इस पुड़िया में नमक ही है, आप कैसे कह सकते हैं।

जज ने तुरंत पुड़िया में रखा पदार्थ चखते हुए कहा, यह नमक ही है। इस पर त्यागी जी ने कहा, आप ने हिन्दुस्तानियों का बनाया हुआ नमक चख लिया है। नेगी जी बताते हैं कि लगभग डेढ़ साल की सेवानिवृत्ति के बाद अंग्रेज जज भी स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए।

सभी शांतभाव से नेगी जी को सुन रहे थे। नेगी जी ने गांधी जी के दर्शन का गहरा अध्ययन किया है। उन्होंने बताया कि गांधी जी की 150 वीं जयंती मनाई जा रही है, लेकिन बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि यह वर्ष उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी, जिनको हम बा के नाम से भी जानते हैं, की भी 150 वीं जयंती है। वह गांधी जी से छह माह बड़ी थीं।

गांधी जी के दर्शन और उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण प्रसंगों पर चर्चा करने के बाद नेगी जी ने बच्चों से पूछा कि स्वतंत्रता संग्राम में गांधी जी का क्या योगदान था। हम सब और बच्चे तो उनको सुनने गए थे, इसलिए सबने कहा, आपसे ही जानना चाहेंगे।

नेगी जी ने कहा, गांधी जी ने अकेले ही देश को आजाद नहीं कराया। देश को आजादी तो यहां के वीर स्वतंत्रता सेनानियों और जनता ने एकजुट होकर संघर्ष करके दिलाई। गांधी जी का योगदान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने सिखाया कि देश को आजादी कैसे मिलेगी। उन्होंने स्वतंत्रता के आंदोलन का महान नेतृत्व किया।

इसके बाद स्मारक स्थल पर सभी ने 20 पौधे लगाए और उनकी सुरक्षा का संकल्प लिया। मैती आंदोलन के जनक कल्याण सिंह रावत ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में बांज के ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाए जाने चाहिए। स्मारक स्थल पर लगाए पौधों की देखरेख करना भी बहुत जरूरी है।

एक बात और जो उन्होंने महसूस की, वो यह कि जब बच्चे पौधे लगाने के लिए गड्ढे बना रहे थे, तब वो पसीने से तर बतर थे। आपका पसीना यानी मेहनत ही इन पौधों को अपनी जड़ें जमाने का मौका देगा। पेड़ आपकी मेहनत के बदले आपके स्रोतों की रीचार्ज करके आपको जल देंगे। आपको के लिए बारिश कराएंगे।

मानवभारती के निदेशक डॉ. हिमांशु शेखर ने बच्चों से कहा, आप जीवन में तरक्की करो और प्रकृति का ख्याल रखो। आप सभी बच्चों से मुलाकात होती रहेगी। हम उम्मीद करते हैं कि आप सभी को अपने सपनों को उड़ान के लिए मजबूत पंख मिलेंगे।

खाराखेत से वापस लौटते हुए साल के पेड़ से गिरे हुए बीजों से पूरा रास्ता पटा था, जो किसी कारपेट से कम नहीं दिखता। साल के ये बीज प्रकृति का वो उपहार हैं, जिनको वनों में फैला दिया जाए तो कुछ ही वर्ष में जंगल उतने घने हो जाएंगे, जिसकी हम कल्पना भी नहीं करते।

यानी प्रकृति ज्यादा से ज्यादा पेड़ों को उगाने के पूरे अवसर उपलब्ध करा रही है, ताकि जीवों पर परोपकार, परोपकार और बस परोपकार होता रहे। फिर मिलते हैं किसी और पड़ाव पर…। तब तक के लिए बहुत सारी खुशियों और शुभकामनाओं का तक धिनाधिन।

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