The social and economic truth of Cordyceps sinensis

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कीड़ाजड़ी का सामाजिक और आर्थिक सच                 

चिपको आन्दोलन की घाटी आज पेड़ बचाओ के संदेश से हटकर कीड़ाजड़ी संग्रहण के विवादों में चर्चित हो रही है। जनपद चमोली में नीति मलारी घाटी के क्षेत्र के उच्च हिमालयी बुग्यालों में पाए जाने वाली कीड़ाजड़ी अब आपसी संघर्ष का कारण बन गई है। सबसे दुखद पहलू तो यह है कि कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने के लिए लोग हिमालयी बुग्यालों में लड़ने लगे हैं।

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जेपी मैठाणी

बात कुछ समय पहले की है, जब कीड़ाजड़ी लेने बुग्याल गए रैणी व सुभांई गाँव के लोग जंगल में ही आपस में लड़ने लगे, जिसमें रैणी पल्ली गाँव की तीन महिलाओं को चोट तक लग गई। दूसरी ओर विवाद बढ़ने पर कई गाँवों के लोगों ने नन्दा देवी बायोस्फियर के जोशीमठ कार्यालय में धरना प्रदर्शन किया।  यह स्थिति कमोवेश प्रदेश के अन्य हिमालयी जनपदों जैसे- उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ व चंपावत में भी देखी जा रही है।

क्या है कीड़ाजड़ी

कोर्डीसेप्स साइनेन्सिस  यानी कीड़ा जड़ी उच्च हिमालय के बुग्यालों में 3000 से 6000 मीटर की ऊँचाई पर पाया जाने वाला एक फंगस प्रजाति है। इसका आधा आकार केटरपीलर या रेंगते हुए कीड़े जैसा होता है। इसके मस्तिष्क के केन्द्र पर एक काला तन्तु जैसा निकला रहता है। जो जमीन के ऊपर दिखता है लेकिन कीड़ानुमा भाग जमीन में धंसा रहता है जो बुग्याल की नम मिट्टी के अन्दर रहता है। बर्फ के पिघलने के साथ ही इस कीड़े जैसी जड़ से बाहर एक काला एवं भूरे रंग का एन्टीना जैसा निकल आता है। बुग्याल की घास के बीच बहुत ध्यान से देखने पर ही यह दिखाई देता है। उसके बाद इसे खोदकर सुरक्षित बाहर निकाला जाता है। ऐसी कीड़ाजड़ी जिसका जड़ एवं ऊपरी हिस्सा अलग-अलग हो जाए, उसका कम मूल्य मिलता है। यह फंगस या जन्तु कीड़े के बीज के सहजीवी संबंध को पेश करता है। बर्फ के पिघलने के साथ बुग्याल की घास तुरन्त बढ़ती नहीं है, इसलिए ऐसे समय में उत्तराखंड ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र के ग्रामीण अधिक से अधिक कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने के लिए अप्रैल माह से ही बुग्यालों में डेरा डाल लेते हैं। बाद में बरसात के मौसम में बुग्याल की घास में कीड़ाजड़ी ढूँढ पाना उसी तरह है जैसे कि भूसे के ढेर में सुई तलाशना।  IMG_0449
इस जड़ी के बनने की प्रक्रिया काफी रोचक है हालांकि प्रमाणित जानकारी का अभाव है। कुछ विशेषज्ञ बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों के चार से पांच हजार मीटर के अल्पाइन मिडोज (बुग्याल या घास के मैदान) में मोथ या पतंगा जैसे कीड़े अक्तूबर-नवम्बर में प्रजनन के बाद बुग्यालों में खुले रूप से अंडे छोड़ देते हैं। ये अंडे बाद में लारवा में बदल जाते हैं। ठीक इसी दौरान बुग्यालों में बर्फ पड़ जाती है, बर्फ के नीचे लारवा दबा रहता है। लेकिन बुग्याल की घास में मौजूद कुछ परजीवियों को लारवा भोजन के रूप में ग्रहण करता है, लेकिन ये परजीवी वापस धीरे-धीरे उसे ही  बर्फ के नीचे न्यूनतम तापमान में खत्म कर देते हैं और यह सूक्ष्म परजीवी लारवे के शरीर के आकार में परिवर्तित हो जाता है। (यानि ये परजीवी लारवे के शरीर के खोल में उसी ढाँचे में जमा हो जाते हैं, बाद में कीड़ाजड़ी का रूप धारण कर लेते हैं।) लेकिन जिन लारवों के शरीर में सूक्ष्म परजीवी नहीं होते वे अपना जीवन चक्र पूरा कर कीट में परिवर्तित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया अक्तूबर से अप्रैल तक चलती है।
स्थानीय लोग हिमालयी क्षेत्रों में इस महत्वपूर्ण जड़ी को निकालने का समय बर्फ पिघलने साथ ही शुरू करते हैं। मई से जून तक इन क्षेत्रों में इस जडी को निकाला जाता है। वर्षा ऋतु में यह जड़ी अत्यधिक बारिश के कारण सड़ जाती हैं, जिसे उपयोग में नहीं लिया जाता है। कीड़ाजड़ी को दोहन के बाद साफ करके हल्का सुखाया जाता है और उपयोग के लिए तुरन्त ही दवा बनाने वाले के पास पहुँचाना होता है। अन्यथा बिना कोल्ड स्टोर के इसे रखने पर यह भुरभुरी होकर अपघटित हो जाती है, इसका भार घट जाता है। ऐसा माना जाता है कि तब इसकी क्षमता या विशिष्ट गुण समाप्त हो जाते हैं।

कीड़ाजड़ी का आयुर्वेदिक या चिकित्सीय उपयोग
कीड़ाजड़ी का उपयोग कैंसर, हृदय रोग और त्वचा आदि की चिकित्सा पद्धति में किया जाता है। पुरूषों की यौन शक्तिवर्द्धक के रूप में यह सर्वाधिक प्रचारित-प्रसारित हुई है। जिसके कारण इसकी अंतर्राष्ट्रीय मांग के साथ-साथ इसका मूल्य भी लगातार बढ़ता जा रहा है। आज से पांच वर्ष पूर्व जहाँ कीड़ाजड़ी  का मूल्य 80 हजार से 1 लाख रुपये तक था वो बढ़कर 17-18 लाख रुपये हो गया है। प्राकृतिक वियाग्रा का स्थान पा चुकी कीड़ाजड़ी ने हिमालयी क्षेत्रों के गाँवों में जहाँ स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान दिया है।  
यूरोप तथा अमेरिकी देशों में इसकी मांग बढ़ती जा रही है। पर्यावरणविद् कहते हैं कि कीड़ाजड़ी के बारे में लिखित प्रमाण 15वीं शताब्दी में मिलता है। इसे यारसागुम्बा के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे केटरपीलर फंगस कहते हैं। वस्तुतः यह फंगस है। दुनियाभर में एस्कोमाइसीटी फंगस की चार सौ से अधिक प्रजाति पाई जाती हैं, जो प्रमुख रूप से भारत, चीन, नेपाल, भूटान, तिब्बत, जापान में उगती है। तिब्बत के प्रसिद्ध डा. जुरखार न्याम्नी दोरजे के परंपरागत चिकित्सा पद्धति के साहित्य में इसका सर्वाधिक लिखित प्रमाण मिलता है। तिब्बती चिकित्सा पद्धति में इसके सर्वाधिक उपयोग बताए गए हैं। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने से लेकर नपुंसकता के इलाज और यौवनवर्द्धक में इसका इस्तेमाल बताया गया है।  

कीड़ाजड़ी और बाजार
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रचार-प्रसार के अपने विशिष्ट गुणों की वजह से जहाँ कीड़ाजड़ी का अवैज्ञानिक दोहन बढ़ा है, वहीं दूसरी तरफ इसका मूल्य लगातार बढ़ता जा रहा है। चीन दुनिया में कीड़ाजड़ी का सबसे बड़ा बाजार है। जबकि नेपाल कीड़ाजड़ी संग्रहण और भारत से कीड़ाजड़ी के स्मगलिंग का महत्वपूर्ण पड़ाव कहा जाता है। यही नहीं एक डाक्यूमेंट्री में यह भी दिखाया गया कि किस प्रकार कीड़ाजड़ी के संग्रहण और व्यापार में नेपाल में माओवादी सक्रिय हैं और कीड़ाजड़ी संग्रहणकर्ताओं या बेचने वालों से स्वयं ही टैक्स वसूलते हैं।
1980 में एक किलो कीड़ाजड़ी का मूल्य चीन में 1800 यूआन था, वहीं 2013 में इसका मूल्य एक लाख 25 हजार से 5 लाख यूआन तक पहुँच गया है। 2012 में बीबीसी की रिपोर्ट में बताया गया कि एक कीड़ाजड़ी का मूल्य 150 रुपये यानि दो से तीन डालर जो भारत की सरकारी दैनिक मजदूरी से अधिक है। विश्व बाजार में सबसे कम गुणवत्ता वाली एक किलो कीड़ाजड़ी का मूल्य 3000 डॉलर तथा सबसे अधिक गुणवत्ता वाली जड़ी का मूल्य 18000 डॉलर है। उत्तराखंड में कीड़ाजड़ी का सरकारी समर्थन मूल्य 1 लाख 80 हजार रुपये प्रति किलो है। जबकि गैर सरकारी या तस्करी का मूल्य जो 2002 में 70-80 हजार रुपये प्रति किलो था और 2013 में 15 लाख रुपये प्रति किलो के आसपास था।
अकेले जनपद चमोली के डेढ़ सौ से अधिक गाँवों के 15 से 20 हजार परिवार प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से कीड़ाजड़ी संग्रहण और विपणन में जुटे हुए हैं। राज्य में  हर वर्ष लगभग 100 से 150 करोड़ का कीड़ाजड़ी का व्यापार हो रहा है। जिसका कोई लाभ भेषज संघ , वन विभाग, स्थानीय वन पंचायत और ग्राम पंचायत को नहीं हो रहा है। जहाँ एक ओर कीड़ाजड़ी लोगों की आर्थिक स्थिति को सुधारने में सहायक सिद्ध हो रही है, दूसरी तरफ अकेले जनपद चमोली के बुग्याली क्षेत्रों के गाँवों में कीड़ाजड़ी से जुड़े  विवाद बढने के समाचार अखबारों में जगह बना रहे हैं। यही नहीं जनपद पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, टिहरी से भी कीड़ाजड़ी व्यापार एवं संग्रहण से संबंधितविवाद बढ़ रहे हैं। जिसकी वजह से ग्राम पंचायत, वन पंचायत के झगड़े मारपीट की घटना भी बढ़ती जा रही है। यही नहीं उत्तराखंड सरकार व वन विभाग ने कीड़ाजड़ी के खुले व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया है। वन विभाग और भेषज संघ ने इसका मूल्य 1 लाख से 2 लाख के बीच में रखा है। इसलिए अधिकतर लोग इसका धंधा चोरी छिपे कर रहे हैं, क्योंकि तस्करी वाले बाजार में बेचने पर कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने वाले परिवार को 10 से 15 गुना अधिक मूल्य मिल जाता है। इसलिए ग्रामीण सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य या कागजी कार्यवाही में पड़ने की बजाय बुग्यालों में ही सौदा कर लेते हैं। जाहिर है कीड़ा जड़ी की तस्करी बिना मिलीभगत के नहीं हो सकती।  

यहां है कीड़ा जड़ी का खजाना
जोशीमठ क्षेत्र के बुग्याल- रीठा बुग्याल, गोरसों, काकभुषुंडि झील क्षेत्र, क्वांरीपास, खीरों घाटी, रक्तवन, नन्दा देवी बायोस्फियर के कोर जोन से लगे बुग्याल, घाट क्षेत्र में सात ताल, छतरकुड़ी, सिम्बे, मारखोली, कुटग्याल हद्यान, सप्तकुण्ड, नंदा खर्क, लम्ब पातल, लार्ड कर्ज़न पास के ऊपरी क्षेत्र के बुग्याल, पीपलकोटी बेमरू से ऊपर तोली ताल, पनार, मनपई, घियाविनायक और बण्डी धुर्रा,  बिरही घाटी में दुग्धकुण्डी क्षेत्र, देवाल में बेदनी बुग्याल और विनायक क्षेत्र में सर्वाधिक कीड़ाजड़ी पाई जाती है।

विवाद की वजह यह भी
वन पंचायतों के कानून के जानकार और स्थानीय निवासियों के हक-हकूकों की पैरवी करने वाले हेम गैरोला ने बताया कि सरकारी पहल के रूप में तीन-चार साल से कीड़ाजड़ी को लेकर अधिकारियों ने कई बैठकें कीं। कीड़ाजड़ी एल्पाइन क्षेत्र में उगती है, जो खर्क और छानियों से ऊपर है। उन्होंने बताया कि वन एवं ग्राम्य विकास आयुक्त के कार्यवृत्त में यह स्पष्ट लिखा गया है कि जिन एल्पाइन क्षेत्रों में कीड़ाजड़ी होती है, उन्हीं के पास के वन पंचायत को स्पष्ट रूप से चिन्हित करके कीड़ाजड़ी  संग्रहण के लिए परमिट एवं क्षेत्र वहाँ के ग्रामीणों की सहमति पर दिया जाना चाहिए, लेकिन प्रमुख वन संरक्षक के आदेश में यह लिख दिया गया है कि परमिट वन पंचायत जारी करेगी।  यानि इस आदेश के अनुसार ऐसे गाँव की वन पंचायत भी परमिट जारी कर सकती है जिसका कोई एल्पाइन जंगल या बुग्याल है ही नहीं। यही वजह है कि कीड़ाजड़ी को लेकर बाहरी गाँव और भीतरी गाँव का विवाद बढ़ता जा रहा है।

कीड़ाजड़ी संग्रहण और ग्रामीण विकास
मार्च माह के समाप्त होने के साथ ही जुलाई तक उच्च हिमालयी क्षेत्रों के गाँवों जैसे- जोशीमठ ब्लाक  में मोल्टा, दाड़िमी, गणाई, पल्ला, डुमक कलगोठ, जखोला, उर्गम, सलना, टंगणी, पैनी, सलूर डुंग्रा, बड़ा गाँव, करछौं, तुगासी, सलधार, वल्ली रैणी, सुभांई, बचुरा, चांचड़ी, लाता, सुराई थोटा, पैंग, मुरूंडा आदि, दशोली के स्यूंण, बेमरू, पाणा, ईराणी, झींझी, दुर्मी, पगना, सग्गर गंगोल गाँव, मंडल आदि तथा  घाट ब्लाक के कासखण्ड के बेरास कुण्ड, कांडई, भेंटी, बंगाली, सुतोल, कनोल, गुलाड़ी, कुरूड़, पेरी आदि गाँवों के अधिकतर परिवार बुग्यालों में कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने जा रहे हैं। घरों में बुजुर्ग, छोटे बच्चे और कुछ महिलाएं ही रह जाते हैं।
 हालांकि ऊँचे बुग्याल क्षेत्रों में जहाँ तापमान कभी-कभी सामान्य से माइनस 20 डिग्री सेंटीग्रेड भी हो सकता है। वहाँ कम सुविधाओं के साथ रहकर कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने का काम आसान नहीं है। तेज तूफानी, बर्फीली हवाओं और हिमखंडों के एवलांच और दुर्गम स्थानों पर कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने का लालच कई युवाओं को असमय मौत के मुँह में धकेल चुका है। वहीं दूसरी ओर इस दौरान गाँव के विकास कार्य और योजनाओं का क्रियान्वयन बिल्कुल ठप पड़ जाता है। कीड़ाजड़ी के संग्रहण के समय पर मनरेगा, जड़ी-बूटी कृषिकरण, सरकारी व गैर सरकारी विभागों और संस्थाओं की योजनाएं मानव श्रम के अभाव में ठप पड़ जाती हैं।
कीड़ाजड़ी संग्रहण और बच्चों की भूमिका
कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की लालसा में उच्च हिमालयी क्षेत्र के गाँवों में 12-13 साल से बड़े बच्चों को भी कीड़ाजड़ी इकट्ठा करने के काम में लगा रहे हैं। हाड़ कंपा देने वाली ठंड में बच्चे बुग्यालों में ही परिवारों के साथ जाने लगे हैं। एक आंकड़े के अनुसार इस दौरान ऊँचे क्षेत्रों में स्थित गाँवों के सातवीं आठवीं से आगे की कक्षा के छात्रों की उपस्थिति ( जून में ग्रीष्म अवकाश भी रहता है) काफी कम रहती है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।
कीड़ाजड़ी व्यापार का पर्यटन प्रभाव
उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश के रूप में प्रचारित-प्रसारित करने के बावजूद यहाँ की टूर-ट्रैवल एजेंसियों को ट्रैकिंग के वक्त स्थानीय गाइड एवं पोर्टर मिलने मु्श्किल हो गए। जोशीमठ व गोपेश्वर में व्यावसायियों से हुई वार्ता के अनुसार आजकल ऊँचाई वाले गाँवों जैसे- घाट, दशोली व जोशीमठ के लगभग सभी ग्रामीण सारे काम-धाम छोड़कर बुग्यालों में (पनार, मनपई, औली, गोरसों, बेदनी) चले गए हैं। उन्हें अब पुनः पोर्टरों और गाइडों के लिए नेपाल से आए मजदूरों पर निर्भर होना पड़ रहा है। राज्य में शुरुआत में कीड़ाजड़ी और झूला (लाइके़न जो बांज के पेड़ों से निकलता है) इकट्ठा करने का काम यहाँ रोजगार की तलाश में नेपाल से आने वाले मजदूर ही करते थे।
रोजगार के साथ दुष्प्रभाव भी
यह सच है कि कीड़ाजड़ी के बाजार और विपणन व्यवस्था में जहाँ एक ओर ग्रामीणों के पास एक नया लेकिन कठिन और अधिक पैसे देने वाला अल्पकालिक रोजगार का विकल्प विकसित हुआ है वहीं इसके कई दुष्प्रभाव भी दिखाई दे रहे हैं। सरकार या वन विभाग की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। प्रदेश के शोध संस्थान कीड़ाजड़ी संरक्षण के लिए खास प्रयास नहीं कर रहे हैं। अगर शोध हो भी रहे हैं तो वे जनसुलभ नहीं हैं। वन पंचायतों के माध्यम से कीड़ाजड़ी संग्रहण और उसका भेषज संघ से विपणन विवादास्पद है। जहाँ वन पंचायतों के अधिकार क्षेत्र नहीं हैं, जैसे- रिज़र्व फारेस्ट, नेशनल पार्क और बायोस्फ़ियर वहाँ वन पंचायतों की भूमिका तय कर एक बेईमानी प्रक्रिया थोपी जा रही है। प्रदेश के कुछ दबंग कीड़ाजड़ी व्यापार में दखल रखते हैं।  हाँ, सुखद यह है कि साल भर में स्वतः खत्म हो जाने वाला कीड़ाजड़ी या कोर्डिसेप्स कई परिवारों के लिए कई सालों की आमदनी का सशक्त विकल्प उभरकर सामने आया है।

  • लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण व स्वरोजगार के लिए काम कर रहे आगाज फैडरेशन के अध्यक्ष हैं।

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