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दीपा कौशलम - उत्तराखंड से विस्कोम्प पुरस्कार की विजेता

दीपा को विसकोम्प आइकॉन ऑफ़ करेज अवार्ड 2016

जेपी मैठाणी

साधारण सी दिखने वाली दीपा में गजब का साहस और हिम्मत है। अपने जीवन की लड़ाई लड़ते हुए दीपा ने असंगठित क्षेत्र की घरेलू कामगार महिलाओं के साथ-साथ दुकानों और घरों में काम करने वाली युवतियों और महिलाओं के लिए छोट-छोटे काम शुरू किये। दीपा कौशलम को दलाई लामा की प्रतिष्ठित संस्था विसकाॅम्प WISCOMP साहस अवार्ड 2016 के लिए उत्तराखण्ड से चुना गया है। आज उनको देश की राजधानी दिल्ली में इण्डिया इंटरनैशनल सेन्टर में WISCOMP – ICON OF COURAGE अवार्ड से सम्मानित किया जा रहा है। दीपा उत्तराखंड में महिला शिक्षा प्रेरक और प्रशिक्षक भी है.

दीपा और उसकी साथियों ने परित्यक्ता, तलाकशुदा, घरेलू हिंसा, यौन पीड़िताओं की मदद के लिए काम करते हुए प्रत्यक्ष रूप से वर्ष 2008 से 2016 तक 800 महिलाओं को विभिन्न प्रकार की कानूनी, स्वरोजगार एवं मोटिवेशनल काउंसलिंग दी साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से कुछ अवसरों पर जैसे- दहेज हत्या, बलात्कार, घरेलू हिंसा, इव टीज़िंग या कार्य स्थलों पर यौन उत्पीड़न, मानव अधिकारों का हनन आदि पर 5400 के आस-पास महिलाओं को सहयोग दिया है।

उत्तराखण्ड प्रदेश की राजधानी देहरादून को अपना कार्यक्षेत्र बनाने के साथ दीपा ने यहाँ की झुग्गी क्षेत्रों की महिलाओं को संगठित कर उनके छोटे-छोटे समूहों का निर्माण किया। इसी यात्रा के दौरान उसे अनेक ऐसी महिलायें मिली जो विभिन्न प्रकार की घरेलू हिंसा से पीड़ित थीं।

दीपा कौशलम विस्कोम्प अवार्ड विजेता

कालान्तर में अपने कार्यों को संगठित रूप से करने के लिए दीपा और कुछ अन्य महिलाओं ने साथ मिलकर अस्तित्व सामाजिक संस्था का गठन किया। जिसे बाद में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, राज्य महिला आयोग द्वारा सेवा प्रदाता (सर्विस प्रोवाइडर) का काम सौंपा।

दीपा बताती है कि ये पूरी लड़ाई उतनी सरल नहीं थी जब तक मैं स्वयं इस संघर्ष और पीड़ा से नहीं गुजरी। वर्ष 2008 में अस्तित्व की स्थापना प्रीति किरबट ने की उससे पहले मैं एक वालंटियर के रूप में कार्य करती थी। मेरे जीवन में घटे घटनाक्रमों के बाद मैंने अस्तित्व में अपनी सेवायें देने का निर्णय लिया। मैं उससे पहले देहरादून के 3 केन्द्रीय विद्यालयों में पी0जी0टी0 टीचर के रूप में अंग्रेजी पढ़ाती रही।

दीपा कौशलम ने अस्तित्व के समर्पित लीडर और प्रेरक होने के नाते महिलाओं के मुद्दों पर कार्य कर रही संस्थाओं के साथ नेटवर्क बढ़ाया और दूसरी तरफ संघर्षशील महिलाओं को एकजुट करने का कार्य किया। इस पूरी लड़ाई में वो अकेली सिर्फ शुरू के दौर में थी बाद में प्रीति किरबट, सुनीता सिंह, वैशाली और ममता उसकी इस लड़ाई में मददगार हुई और आज भी अस्तित्व लगातार राजधानी देहरादून में उपेक्षित एवं गरीब महिलाओं को कानूनी सलाह दिलाने, महिला हेल्पलाइन की मदद दिलाने में सहयोग कर रही है। गौरतलब है कि शुरूआत में अस्तित्व की सूक्ष्म परियोजना को ममा कैश नाम की संस्था ने सहयोग किया था। दीपा बताती है कालान्तर में साझा मंच ने भी इस कार्य में सहयोग किया।

दीपा देहरादून में आज भी संघर्षशील महिलाओं और युवतियों को संघर्ष स्वरोजगार, पढ़ाई और संगठन निर्माण के लिए प्रेरित कर रही है। अपने दो बच्चों के बेहतर लालन-पालन के साथ-साथ महिला संगठन निर्माण के लिए जुटी हुई है। दीपा कहती है मैंने अपने दोनों बच्चों को भी बचपन से ही मजबूत होने की सीख दी है। शिक्षा और जागरूकता को ही महिला अधिकारों और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानती है।

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